शाम-ए-बनारस: गोदौलिया की रौनक से दशाश्वमेध घाट की आरती तक
अगर बनारस की सुबह मंदिरों की है, तो शाम गलियों की। गोदौलिया से दशाश्वमेध घाट की ओर जाने वाली सड़कों पर रात साढ़े आठ बजे भी भीड़ कम नहीं होती — और यही रौनक इस शहर की असली पहचान है। यहां का स्ट्रीट फूड जितना मशहूर है, उतना ही किफ़ायती भी। शुरुआत चटपटी पानी पूरी से करें, फिर भाप उड़ाते वेज मोमो का स्वाद लें — आधी प्लेट आज भी करीब बीस रुपये में मिल जाती है। मीठे में रबड़ी से सजा गुलाब जामुन और साथ में खस्ता कचौड़ी — पहली बार आने वाले अक्सर इस माहौल की तुलना दिल्ली के चांदनी चौक से करते हैं। खाने के बीच बाज़ार भी कम आकर्षक नहीं। पचास से सौ रुपये तक के झुमकों से सजी दुकानें, बनारसी साड़ियों, शॉलों और रुद्राक्ष मालाओं का कारोबार देर रात तक चलता रहता है। इस पैदल सफ़र में शहर का बहुरंगी चरित्र भी खुलता है। पुरानी धर्मशालाओं पर तमिल और तेलुगु में लिखे बोर्ड बताते हैं कि काशी सदियों से पूरे भारत के तीर्थयात्रियों का घर रही है। पास ही गोदौलिया का ऐतिहासिक सेंट थॉमस चर्च मंदिरों और अखाड़ों के साथ इस शहर की साझा विरासत का हिस्सा है। गलियों का यह सफ़र आखिरकार दशाश्वमेध घाट पर जाकर खत्म होता है, जहां विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती होती है और नावें घाटों की अर्धचंद्राकार कतार की सैर कराती हैं। शिलॉन्ग जैसे दूर-दराज़ से आए यात्री भी यही कहते हैं — बनारस वाकई कुछ और ही है, और इसे समझने के लिए गलियों में बिताई एक शाम ही काफ़ी है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: