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मिट्टी के अखाड़े से ओलंपिक पूल तक: राष्ट्रीय खेल दिवस पर काशी ने गिने अपने बारह ओलंपियन
खेल2 दिन पहले

मिट्टी के अखाड़े से ओलंपिक पूल तक: राष्ट्रीय खेल दिवस पर काशी ने गिने अपने बारह ओलंपियन

29 अगस्त को मेजर ध्यानचंद की जयंती पर मनाया जाने वाला राष्ट्रीय खेल दिवस बनारस के लिए अपने खिलाड़ियों को गिनने का दिन भी है। काशी से नाता रखने वाले बारह खिलाड़ी ओलंपिक खेलों तक पहुँचे हैं — और उनमें से ज़्यादातर उस दौर के हैं जब शहर के अभ्यास-स्थल सिंथेटिक ट्रैक नहीं, मिट्टी के अखाड़े और खुले मैदान हुआ करते थे। सूची 1948 से शुरू होती है। उस साल लंदन ओलंपिक में अनंत राम भार्गव ने भारत के लिए कुश्ती लड़ी, और सचिन नाग ने उसी ओलंपिक में 100 मीटर तैराकी तथा वाटर पोलो में हिस्सा लिया; 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भी वे उतरे। 1951 में दिल्ली के पहले एशियाई खेलों में उन्होंने 100 मीटर तैराकी का स्वर्ण जीता था। गुलजारा सिंह हेलसिंकी में लंबी दूरी की दौड़ में शामिल हुए। लक्ष्मीकांत पांडेय, जिन्हें शहर के पहलवानी हलक़ों में 'छिक्कन पांडेय' कहा जाता था, 1956 में मेलबर्न पहुँचे। इन्हें जोड़ने वाली चीज़ पदक से ज़्यादा वह रास्ता है। बिना आधुनिक सुविधाओं के, मोहल्ले के अखाड़ों और स्कूल के मैदानों से निकलकर ये खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम तक पहुँचे — और आज ट्रायल में उतरने वाले शहर के तैराकों, पहलवानों और धावकों के लिए एक राह छोड़ गए। जिस दिन बाक़ी देश ध्यानचंद को याद करता है, बनारस के पास याद करने के लिए अपने भी कुछ नाम हैं।

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ग्यारह हज़ार रुद्राक्ष और कथक की एक शाम: दुर्गाकुंड के कूष्मांडा मंदिर में भजन संध्या से सावन की विदाई
मनोरंजन2 दिन पहले

ग्यारह हज़ार रुद्राक्ष और कथक की एक शाम: दुर्गाकुंड के कूष्मांडा मंदिर में भजन संध्या से सावन की विदाई

दुर्गाकुंड के आदिशक्ति माँ कूष्मांडा मंदिर में सावन पूर्णिमा ग्यारह हज़ार रुद्राक्ष के दानों के बीच बीती। श्रृंगार पं. ऋषभ दुबे ने किया — रुद्राक्ष के साथ माँ को नए वस्त्र और आभूषण भी धारण कराए गए। दिन भर दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी रही। इसके बाद भव्य आरती हुई और प्रतीक्षा कर रहे सभी लोगों में प्रसाद बाँटा गया। रात संगीत के नाम रही। गीतकार कन्हैया दुबे द्वारा आयोजित भजन संध्या में मंदिर भजनों और सावन की विदाई पर बनारस में गाए जाने वाले लोकगीतों से गूँजता रहा। बीच-बीच में डॉ. ममता टंडन की शिष्याओं ने कथक की प्रस्तुतियाँ दीं, और शाम भर स्थानीय कलाकार एक के बाद एक माइक पर आते रहे। कार्यक्रम के बाद मंदिर के महंत पं. धन्नी शंकर दुबे ने कलाकारों और आयोजकों को स्मृति-चिह्न व भेंट देकर सम्मानित किया। कूष्मांडा नवदुर्गा क्रम की नौ देवियों में से एक हैं और काशी में उनका स्थान दुर्गाकुंड पर है। सावन पूर्णिमा महीने का आख़िरी सुर है, और शहर ने उसे इस बार इसी शांत तरीके से विदा किया — न जुलूस, न बैरिकेडिंग, न भीड़ प्रबंधन की कोई योजना। बस रुद्राक्ष में लिपटा गर्भगृह, देर रात तक भरा हुआ परिसर, और उतनी लंबी शाम जितने कलाकारों के पास गीत थे।

बीएचयू में आठ ज़िलों के नब्बे शिक्षक सम्मानित: शिक्षक दिवस से पहले शिक्षा पर संगोष्ठी
शिक्षा2 दिन पहले

बीएचयू में आठ ज़िलों के नब्बे शिक्षक सम्मानित: शिक्षक दिवस से पहले शिक्षा पर संगोष्ठी

काशी में शिक्षक दिवस का मौसम रविवार को कुछ पहले ही शुरू हो गया — काशी हिंदू विश्वविद्यालय का एक सभागार शिक्षकों से भरा रहा। सामाजिक विज्ञान संकाय के संबोधि सभागार में भारत की शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों और संभावनाओं पर संगोष्ठी हुई, जिसका आयोजन प्रोफ़ेसर हरिहरनाथ त्रिपाठी फ़ाउंडेशन ने किया। अंत में वाराणसी समेत आठ ज़िलों से आए नब्बे शिक्षकों को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। बातचीत नीति की ऊँचाइयों पर नहीं, ज़मीन पर टिकी रही। वक्ताओं ने कहा कि किसी बच्चे के शैक्षणिक, सामाजिक और नैतिक विकास में शिक्षक की भूमिका का कोई विकल्प नहीं है, और शिक्षा को व्यापार की तरह नहीं, चरित्र-निर्माण की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। कई वक्ता बार-बार गाँव और शहर की कक्षाओं के फ़र्क़ पर लौटे और कहा कि बदलते समय के हिसाब से शिक्षा नीति को फिर से गढ़ा जाए, ताकि गाँव के स्कूल के बच्चे को किसी और ही पैमाने पर न तौला जाए। प्रो. अंजलि वाजपेयी, प्रो. धीरज किशोर, प्रो. सरोज उपाध्याय, प्रो. सुप्रिया सिंह और प्रो. विभा राय ने अपनी बात रखी, जबकि कार्यक्रम का संयोजन प्रो. क्षेमेंद्र मणि त्रिपाठी ने किया। शिक्षक दिवस 5 सितंबर को है, और बीएचयू का यह सम्मान उससे हफ़्ता भर पहले हुआ — नब्बे शिक्षक कंधे पर अंगवस्त्र डाले संबोधि से निकले, और स्कूल का पूरा एक हफ़्ता अभी उनके आगे था।

गंगा किनारे इमिग्रेशन काउंटर: सामने घाट पर बनेगा प्रदेश का पहला अंतरराष्ट्रीय क्रूज़ टर्मिनल
यात्रा2 दिन पहले

गंगा किनारे इमिग्रेशन काउंटर: सामने घाट पर बनेगा प्रदेश का पहला अंतरराष्ट्रीय क्रूज़ टर्मिनल

वाराणसी को उत्तर प्रदेश का पहला अंतरराष्ट्रीय क्रूज़ टर्मिनल मिलने जा रहा है, और इसके लिए गंगा किनारे सामने घाट को चुना गया है। नगर निगम लगभग दो एकड़ ज़मीन — करीब 8,094 वर्ग मीटर — भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) को दे रहा है, जो अनुमानित ₹200 करोड़ की लागत से यह टर्मिनल बनाएगा और चलाएगा। अब तक सामने आई योजना किसी साधारण जेटी की नहीं, बल्कि एक पूरे नदी-द्वार की है। डिज़ाइन में इमिग्रेशन और कस्टम काउंटर, मेटल डिटेक्टर और बैगेज स्कैनर, सीसीटीवी निगरानी, यात्री लाउंज, कैफेटेरिया, ड्यूटी-फ़्री शॉपिंग, वाहन पार्किंग और दिव्यांग यात्रियों के लिए बाधामुक्त रास्ते शामिल हैं। पूरी क्षमता पर यह भवन एक साथ करीब दस हज़ार यात्रियों को संभालने के लिए सोचा गया है — यानी कोच्चि के 2,253 वर्ग मीटर वाले सागरिका क्रूज़ टर्मिनल से लगभग साढ़े तीन गुना बड़ा। शहर के लिए इसका मतलब है गंगा किनारे एक असली आगमन-द्वार: हवाई जहाज़ से नहीं, पानी के रास्ते काशी पहुँचते यात्री, और बंगाल में हल्दिया तक जाता जलमार्ग। फ़िलहाल प्राधिकरण के मुख्यालय में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हो रही है, इसके बाद ज़मीन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। जहाज़ अभी नहीं चले हैं — पर जिस शहर का असली दरवाज़ा हमेशा नदी रही है, वहाँ फ़ाइल अब उसी दिशा में चल पड़ी है।

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मूल राशि भरिए, ब्याज छोड़िए: बकाया कर पर 15 दिसंबर तक सरचार्ज माफ़
ऑफ़र4 दिन पहले

मूल राशि भरिए, ब्याज छोड़िए: बकाया कर पर 15 दिसंबर तक सरचार्ज माफ़

वाराणसी में अगर गृहकर का बिल वर्षों से बकाया पड़ा है, तो अमूमन उस पर चढ़ा ब्याज ही वह हिस्सा बन जाता है जिससे लोग कतराते हैं। 15 दिसंबर तक नगर निगम वही हिस्सा पूरी तरह हटाने की पेशकश कर रहा है। 15 अगस्त से शुरू हुई एकमुश्त समाधान (ओटीएस) योजना के तहत निगम 1 अप्रैल 2026 से पहले के गृहकर, जलकर और सीवर कर के बकाये पर लगे ब्याज और सरचार्ज में शत-प्रतिशत छूट दे रहा है। बचती है सिर्फ़ मूल राशि — यानी कर स्वयं — और उसे भी अधिकतम तीन आसान मासिक किस्तों में जमा किया जा सकता है, बिना कोई ब्याज जुड़े। यह सुविधा आवासीय, अनावासीय और मिश्रित उपयोग — तीनों श्रेणियों के भवन स्वामियों के लिए खुली है, यानी शहर की अधिकांश दुकानें, किराये की मंज़िलें और पारिवारिक मकान इसके दायरे में आते हैं। जिन घरों का बकाया कई साल पुराना है, उनके लिए हिसाब लगाना फ़ायदे का सौदा है: पुराने बिल पर जमा हो चुका सरचार्ज कई बार मूल रकम के बराबर तक पहुँच जाता है। फ़ाइल साफ़ होना बिक्री, बंधक या दाखिल-ख़ारिज के समय भी काम आता है, जब निगम की अदेयता ही काग़ज़ अटकाने वाली कड़ी बन जाती है। यह खिड़की चार महीने की है और 15 दिसंबर 2026 को बंद हो जाएगी। लाभ लेने के इच्छुक भवन स्वामी नगर निगम से अपना बकाया पता कर उससे पहले जमा कर दें।

मैट पर तीन स्वर्ण: सब जूनियर कुश्ती से दस पदक लेकर लौटा वाराणसी मंडल
खेल4 दिन पहले

मैट पर तीन स्वर्ण: सब जूनियर कुश्ती से दस पदक लेकर लौटा वाराणसी मंडल

पखवाड़े भर पहले वाराणसी मंडल ने शहर में हुए ओपन ट्रायल से अपनी सब जूनियर कुश्ती टीम चुनी थी। वही टीम अब दस पदक लेकर लौटी है। 21 से 23 अगस्त तक हुई राज्य सब जूनियर बालक कुश्ती प्रतियोगिता में मंडल ने तीन स्वर्ण, एक रजत और छह कांस्य पदक जीते। 45 किलोग्राम फ्रीस्टाइल में ऋतिक यादव ने स्वर्ण जीता; ग्रीको-रोमन में पीयूष यादव ने 60 किलोग्राम और रितेश पटेल ने 71 किलोग्राम का ख़िताब अपने नाम किया। 45 किलोग्राम ग्रीको-रोमन में आर्यन को रजत मिला। कांस्य पदक फ्रीस्टाइल में अंगद यादव, दीक्षित यादव, मैत्रेय यादव और आदर्श यादव को तथा ग्रीको-रोमन में विष्णु गुप्ता और अभिनव यादव को मिले। समापन समारोह उत्तर प्रदेश कुश्ती संघ के महासचिव सुरेश चंद्र उपाध्याय की अध्यक्षता में हुआ। वाराणसी कुश्ती संघ के अध्यक्ष राजीव सिंह रानू और सचिव राजकुमार मिश्रा भी पदक वितरण के समय मौजूद रहे। पूर्वांचल में पहलवानी का रास्ता असल में सब जूनियर वर्ग से ही तय होता है — यही आयु वर्ग जूनियर राज्य टीमों और उसके आगे राष्ट्रीय शिविरों तक पहुँचाता है। दस में से छह पदक ग्रीको-रोमन में आए, जो दोनों शैलियों में ज़्यादा कठिन और कम प्रशिक्षित मानी जाती है — यह मंडल भर के अखाड़ों और स्कूल कोचों की चुपचाप की जा रही मेहनत का पता देता है।

गुलाब, बेला और मखमल: सावन की विदाई पर बाबा विश्वनाथ को बंधीं बीस से ज़्यादा राखियाँ
समाचार4 दिन पहले

गुलाब, बेला और मखमल: सावन की विदाई पर बाबा विश्वनाथ को बंधीं बीस से ज़्यादा राखियाँ

शुक्रवार को रक्षाबंधन पर श्री काशी विश्वनाथ धाम का गर्भगृह सज गया, और दिन की पहली राखी ज्योतिर्लिंग को ही बंधी। भोर की मंगला आरती से पहले गुलाब, बेला और मखमली कपड़े से बनी राखी बाबा विश्वनाथ को अर्पित की गई। अनुष्ठान पूरा होते-होते गर्भगृह में बीस से ज़्यादा राखियाँ रखी जा चुकी थीं — काशी की वह परंपरा, जिसमें जिस दिन देश भर में घरों में राखी बंधती है, उस दिन शहर अपने आराध्य को ही भाई मानकर धागा बांधता है। दोपहर में भोग आरती हुई और शृंगार दर्शनार्थियों के लिए बना रहा। मंदिर सावन पूर्णिमा को विशेष दिनों में गिनता है, इसलिए बुकिंग की सामान्य पाबंदियाँ हटा दी गईं और धाम के द्वार सीधे दर्शन के लिए खुले रहे। सुबह से कतारें बढ़ती गईं — शहर की गलियों से और ज़िले के बाहर से आईं महिलाएँ अपने भाइयों की कुशलता की कामना कर आगे बढ़ती रहीं। इस बार दिन का महत्व दोहरा था। सावन इसी पूर्णिमा को विदा हो रहा है, यानी महीने का आख़िरी दर्शन और रक्षाबंधन एक साथ पड़े — पंडितों और पंचांगकारों ने इसे दोहरे शुभ संयोग के रूप में देखा। शाम को झूलनोत्सव का शृंगार हुआ, जिसमें सावन की विदाई पर बाबा झूले पर विराजते हैं; भीड़ सबसे ज़्यादा इसी समय उमड़ी।

अदालत के और क़रीब नि:शुल्क क़ानूनी मदद: बीएचयू विधि संकाय और न्यायपालिका के बीच साझेदारी
शिक्षा4 दिन पहले

अदालत के और क़रीब नि:शुल्क क़ानूनी मदद: बीएचयू विधि संकाय और न्यायपालिका के बीच साझेदारी

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विधि संकाय न्यायपालिका के साथ मिलकर काम करने की तैयारी में है, और इसका असर सबसे पहले उन लोगों तक पहुँचना चाहिए जो वकील का ख़र्च नहीं उठा सकते। संकाय प्रमुख एवं संकायाध्यक्ष प्रो. प्रदीप कुमार सिंह ने विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने जो योजना रखी है, उसके तहत बीएचयू का लंबे समय से चल रहा विधिक सहायता एवं सेवा क्लिनिक अपना नि:शुल्क कामकाज बढ़ाएगा, और विद्यार्थी पाठ्यक्रम का ज़्यादा हिस्सा असली अदालतों में बिताएँगे। नियमित न्यायालय भ्रमण और अधिवक्ताओं के साथ इंटर्नशिप उसी क्लिनिकल लीगल एजुकेशन के साथ जुड़ेंगे, जो यह संकाय 1970 के दशक से पढ़ा रहा है — उस दौर से, जब देश के गिने-चुने विश्वविद्यालय ही ऐसा कर रहे थे। वाराणसी के लिए इसका सीधा मतलब है। शिक्षकों की देखरेख में विद्यार्थियों द्वारा चलाया जाने वाला नि:शुल्क विधिक सहायता क्लिनिक शहर की उन थोड़ी-सी जगहों में है, जहाँ रुकी हुई पेंशन, ज़मीन-जायदाद के उलझे मामले या समझ में न आने वाले मुक़दमे को लेकर कोई भी व्यक्ति बिना फ़ीस दिए योग्य सलाह पा सकता है। क्लिनिक बढ़ेगा तो ऐसी सलाह के घंटे भी बढ़ेंगे। क्लिनिक का काम परिसर की चारदीवारी से बाहर भी दिखा है: 2017 में बंदियों की दिहाड़ी को लेकर उसकी जनहित पहल के बाद प्रदेश सरकार ने दरें संशोधित की थीं। संकाय राष्ट्रीय रैंकिंग में हाल के अच्छे प्रदर्शन का भी हवाला देता है। पचास साल पुरानी इस परंपरा को सेमिनार कक्ष तक सीमित रखने के बजाय अदालतों से जोड़ देना ही इस नई व्यवस्था का असल मक़सद है।

त्रिशूल वाली फ्लडलाइट और घाट जैसी सीढ़ियाँ: गंजारी में अंतिम चरण में काशी का 30 हज़ार दर्शकों वाला क्रिकेट स्टेडियम
खेल5 दिन पहले

त्रिशूल वाली फ्लडलाइट और घाट जैसी सीढ़ियाँ: गंजारी में अंतिम चरण में काशी का 30 हज़ार दर्शकों वाला क्रिकेट स्टेडियम

शहर के दक्षिणी छोर पर राजातालाब के पास गंजारी में बन रहा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम अब पूरा होने के इतने क़रीब है कि बचे हुए कामों की सूची काफ़ी छोटी रह गई है। इस महीने हुए स्थलीय निरीक्षण में अधिकारियों ने ज़िला प्रशासन को बताया कि बड़े ढाँचे बनकर तैयार हैं — दक्षिण दिशा का वीआईपी पवेलियन, पूर्वी और पश्चिमी पवेलियन, मीडिया सेंटर और भीतर का काम। मैदान पर घास बिछ चुकी है और बाहरी विकास कार्य 80 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गया है। मुख्य रूप से अब वही डमरू वाला हिस्सा बाक़ी है, जो इस परिसर की पहचान है। स्टेडियम की बनावट पूरी तरह काशी की अपनी भाषा में गढ़ी गई है: अर्धचंद्राकार छत, त्रिशूल के आकार की फ्लडलाइट, घाटों की तरह सीढ़ीनुमा उतरती दर्शक दीर्घा, और बेलपत्र से प्रेरित बाहरी डिज़ाइन। लगभग 30 हज़ार दर्शकों की क्षमता वाला यह मैदान करीब ₹450 करोड़ की लागत से बन रहा है, जिसका शिलान्यास सितंबर 2023 में हुआ था। उद्घाटन सितंबर में होने की चर्चा है, हालाँकि कोई तारीख़ आधिकारिक रूप से तय नहीं हुई है। जो बात अभी से साफ़ है, वह यह कि पूर्वी उत्तर प्रदेश को अपना पूरा अंतरराष्ट्रीय मैदान मिल जाएगा, और वाराणसी के युवा क्रिकेटरों को — जिन्हें उस स्तर के मुक़ाबलों के लिए अब तक लखनऊ या कानपुर जाना पड़ता है — अपने ही ज़िले में वह सुविधा मिलेगी, साथ में वह खेल पर्यटन भी जो ऐसे मैदानों के पीछे-पीछे आता है।

नि:शुल्क मेहंदी, कजरी और झूमता पूरा पंडाल: रामापुरा के सावन हरियाली महोत्सव में छाईं वार्ड की महिलाएँ
मनोरंजन5 दिन पहले

नि:शुल्क मेहंदी, कजरी और झूमता पूरा पंडाल: रामापुरा के सावन हरियाली महोत्सव में छाईं वार्ड की महिलाएँ

रामापुरा वार्ड ने सावन की अपनी शाम वही करते हुए बिताई, जो बनारस हमेशा से अच्छा करता आया है — मंच अपने ही मोहल्ले की महिलाओं को सौंप दिया और बाक़ी काम सावन के लोकगीतों पर छोड़ दिया। पार्षद राम गोपाल वर्मा द्वारा आयोजित इस सावन हरियाली महोत्सव के केंद्र में मेहंदी प्रतियोगिता रही, जिसमें आने वाली हर महिला के लिए मेहंदी नि:शुल्क लगाई गई और अंत में सर्वश्रेष्ठ हाथों को पुरस्कार मिले। इसके इर्द-गिर्द पूरी शाम सजती रही — कजरी और सावन के दूसरे लोकगीत, गायिका कंचन सिंह का सम्मान, और एक लंबा दौर जिसमें दर्शक बस उठकर नाचने लगे। विधायक सौरभ श्रीवास्तव ने महोत्सव का उद्घाटन किया और कलाकारों को सम्मानित किया। मौजूद रहने वालों में पार्षद विजय द्विवेदी, चंद्रनाथ मुखर्जी और टन्ना साहनी के साथ वार्ड की बड़ी संख्या में महिलाएँ शामिल रहीं। आयोजकों ने इस कार्यक्रम को महिला सशक्तीकरण के इर्द-गिर्द रखा था, और शाम की बनावट ने यह बात किसी भी भाषण से बेहतर कह दी — एक मोहल्ला कार्यक्रम, जिसमें प्रतिभागी, कलाकार और अधिकांश दर्शक उन्हीं चंद गलियों की महिलाएँ थीं। ऐसी हरियाली महफ़िलें हर सावन वाराणसी के मोहल्लों में सजती हैं, और आमतौर पर यही सीज़न का सबसे आनंददायक रूप होती हैं: न टिकट, न कतार, न मंच की दूरी — और गीतों का वह पिटारा, जिसे साथ गाने वाले ज़्यादातर लोगों ने सबसे पहले अपने घर में ही सीखा था।

हरियाली, फल और हिम शृंगार, फिर झूला: सावन के अंतिम बृहस्पतिवार पर सजा दशाश्वमेध का गुरु बृहस्पति देव मंदिर
घटनाएँ5 दिन पहले

हरियाली, फल और हिम शृंगार, फिर झूला: सावन के अंतिम बृहस्पतिवार पर सजा दशाश्वमेध का गुरु बृहस्पति देव मंदिर

सावन का आख़िरी बृहस्पतिवार गुरु बृहस्पति का दिन है, और दशाश्वमेध स्थित गुरु बृहस्पति देव मंदिर इसे उसी अंदाज़ में मनाता है जिस अंदाज़ में काशी हर चीज़ मनाती है — ऐसे शृंगार के साथ, जिसके सामने कुछ देर ठहरकर देखना पड़ता है। मंदिर के महंत अजय गिरि बताते हैं कि इस दिन का शृंगार चार अलग-अलग रूपों में होता है। ताज़ी हरियाली का हरियाली शृंगार, जल विहार, फलों का फल शृंगार और बर्फ़ जैसा दिखने वाला हिम शृंगार। विग्रह को अर्धनारीश्वर स्वरूप में सजाकर झूले पर विराजमान किया जाता है — वही झूला परंपरा, जो सावन भर शहर के मंदिरों में चलती रहती है। शाम भर मंदिर प्रांगण में आमंत्रित कलाकार भजन प्रस्तुत करते हैं, और प्रबंधन को श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ का अनुमान है — ऐसे लोग, जो दर्शन के साथ-साथ सजावट देखने भी आते हैं। बृहस्पतिवार को गुरु बृहस्पति की पूजा बनारस के बहुत से घरों की सालभर की आदत है, जो अक्सर पीले धागे और चने की दाल के साथ घर पर ही निभा ली जाती है। इस ख़ास बृहस्पतिवार को जाने लायक़ बनाती है यह बात कि दशाश्वमेध का यह छोटा-सा मंदिर साल का अपना सबसे भव्य शृंगार इसी दिन के लिए बचाकर रखता है। अगर शाम को आपका रास्ता दशाश्वमेध घाट की ओर जा ही रहा है, तो यह बहुत छोटा-सा मोड़ है और सावन की गलियों वाली सैर में आसानी से जुड़ जाता है।

काशी में मानसून ने 55 दिन में पूरा किया पूरे सीज़न का कोटा: 577 मिलीमीटर बारिश
मौसम5 दिन पहले

काशी में मानसून ने 55 दिन में पूरा किया पूरे सीज़न का कोटा: 577 मिलीमीटर बारिश

वाराणसी में मानसून ने वह सब दे दिया है जो पूरे सीज़न में देना था — और तय समय से काफ़ी पहले। शहर में अब तक 577.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज हो चुकी है, यानी मौसम विभाग के हिसाब से सामान्य 70 दिन के मानसून का पूरा कोटा। काशी ने यह आँकड़ा सिर्फ़ 55 दिन में छू लिया। इस संख्या को और दिलचस्प बनाती है सीज़न की देर से हुई शुरुआत। मानसून आमतौर पर 20 जून के आसपास वाराणसी पहुँच जाता है, लेकिन इस बार वह 1 जुलाई को आया — हफ़्ते भर से भी ज़्यादा देर से। इसके बाद भरपाई तेज़ी से हुई: अकेले सोमवार को करीब 160 मिलीमीटर पानी बरसा, जबकि अगले दिन काफ़ी हल्की 17.6 मिलीमीटर बारिश हुई। यूपी क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अतुल कुमार सिंह ने अमर उजाला को बताया कि मानसून की ट्रफ लाइन इस समय काशी के ऊपर से गुज़र रही है, इसीलिए लगातार तेज़ बौछारें पड़ रही हैं, और करीब एक दिन और गरज-चमक के साथ बारिश की उम्मीद है। उन्होंने एक ज़रूरी बात भी जोड़ी — इतनी तेज़ बारिश ज़मीन में रिसने के बजाय बहकर निकल जाती है, इसलिए काग़ज़ पर कोटा पूरा होने का मतलब यह नहीं कि भूजल स्तर भी उतना ही भर गया। अगले दो दिन शहर में कुछ भी तय करने वालों के लिए — रक्षाबंधन की ख़रीदारी, घाट तक की सैर या सावन का आख़िरी हिस्सा — सलाह सीधी है: छाता साथ रखिए, रास्ते के लिए थोड़ा अतिरिक्त समय लेकर चलिए, और पूरे दिन की बारिश नहीं, रुक-रुक कर आती बौछारों की उम्मीद रखिए।

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काशी से सारनाथ तक पालकी: मूलगंध कुटी विहार से होकर गुज़री शिव की बारात, 501 परिवार हुए शामिल
समाचार6 दिन पहले

काशी से सारनाथ तक पालकी: मूलगंध कुटी विहार से होकर गुज़री शिव की बारात, 501 परिवार हुए शामिल

इक्यावन शंख और इक्यावन ढोल — दिखने से पहले आवाज़ पहुँच गई। बुधवार को शिव की चल प्रतिमा, साथ में पार्वती और बाल प्रथमेश, पालकी पर सवार होकर शहर से सारनाथ की ओर निकलीं। सावन के समापन पर, जैसा काशी कहती है, महादेव सपरिवार ससुराल पहुँचे। इस यात्रा को ख़ास बनाया उसके रास्ते ने। शहर के एक रुद्राभिषेक पीठ और शिव बारात समिति द्वारा आयोजित यह शोभायात्रा जैन तीर्थंकर श्रेयांसनाथ की जन्मस्थली मानी जाने वाली जगह से होकर, चीनी मंदिर के पास से गुज़रते हुए सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार तक पहुँची। एक ही सुबह में शैव यात्रा का जैन और बौद्ध स्थलों से होकर गुज़रना — यह बनारस बिना किसी घोषणा के कर लेता है। आँकड़े भी सोच-समझकर रखे गए थे। इसमें 501 परिवार शामिल हुए, जिनमें अमेरिका और आयरलैंड से आए परिवार भी थे, और सामूहिक अभिषेक के लिए 501 मिट्टी के शिवलिंग बनाए गए। 151 संत-महात्मा पालकी के साथ चले और रास्ते में ब्रह्माकुमारीज़ के सेवादार भी क़तार में जुड़ते गए। इस हफ़्ते शहर में हों तो सारनाथ का यह हिस्सा शोभायात्रा के बाद भी देखने लायक है — मृगदाव और विहार आम दोपहरों में शांत रहते हैं, और काशी से सारनाथ का रास्ता लंबा नहीं है।

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झूले पर छह घंटे के दर्शन: रक्षाबंधन पर टेढ़ी नीम से धाम तक निकलेगी बाबा विश्वनाथ की रजत प्रतिमा
घटनाएँ6 दिन पहले

झूले पर छह घंटे के दर्शन: रक्षाबंधन पर टेढ़ी नीम से धाम तक निकलेगी बाबा विश्वनाथ की रजत प्रतिमा

काशी में सावन का समापन उसी परंपरा से होता है — झूले पर विराजे बाबा विश्वनाथ के दर्शन से। 28 अगस्त, शुक्रवार को श्रावण पूर्णिमा और रक्षाबंधन एक साथ पड़ रहे हैं। टेढ़ी नीम स्थित महंत आवास में रखी बाबा की रजत प्रतिमा शोभायात्रा के साथ श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुँचेगी, जहाँ उन्हें झूले पर विराजमान कर लगभग छह घंटे तक दर्शन कराए जाएँगे। तैयारी एक दिन पहले से शुरू होती है। 27 अगस्त को महंत आवास पर प्रतिमा का हरियाली से शृंगार होगा और वहीं पूजन के बाद यात्रा निकलेगी। शोभायात्रा पारंपरिक वाद्यों के साथ टेढ़ी नीम से चलकर गलियों से होते हुए धाम तक जाती है, इसलिए जो लोग मंदिर के भीतर नहीं पहुँच पाते, उन्हें रास्ते में ही दर्शन मिल जाते हैं। धाम में प्रतिमा को गर्भगृह में स्थापित कर पूजन किया जाएगा और सप्तर्षि आरती से पहले झूलनोत्सव होगा — मंदिर के एसडीएम शंभूशरण ने इसकी पुष्टि की है। शयन आरती के साथ आयोजन पूरा होगा और प्रतिमा वापस महंत आवास लौट जाएगी। व्यवस्था का समन्वय वाचस्पति तिवारी देख रहे हैं। जाने का मन हो तो यह मानकर चलिए कि धाम और आसपास की गलियाँ सबसे अधिक भरी रहेंगी — सावन का यह आख़िरी बड़ा दिन है और उस पर रक्षाबंधन की भीड़ भी। रास्ते में शोभायात्रा के दर्शन करना अपेक्षाकृत आसान रहेगा।

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तीन दिन का शून्य किराया टिकट: रक्षाबंधन पर वाराणसी से महिलाओं की रोडवेज यात्रा नि:शुल्क
ऑफ़र6 दिन पहले

तीन दिन का शून्य किराया टिकट: रक्षाबंधन पर वाराणसी से महिलाओं की रोडवेज यात्रा नि:शुल्क

रक्षाबंधन पर घर जाने वाली बहनों को इस बार रोडवेज बस में एक रुपया भी नहीं देना होगा। प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों में तीन दिन की नि:शुल्क यात्रा की सुविधा दी है — 27 अगस्त, गुरुवार की सुबह 6 बजे से 29 अगस्त, शनिवार की रात 12 बजे तक। यह छूट हर उम्र की महिलाओं के लिए है और किसी एक श्रेणी की बस तक सीमित नहीं है; साधारण हो या उससे ऊपर की श्रेणी, दोनों में यात्रा मुफ़्त रहेगी। वाराणसी के लिए व्यावहारिक बात बेड़े की है। इन दिनों वाराणसी परिक्षेत्र में 500 से अधिक बसें चलेंगी, जिनमें लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर और प्रयागराज जैसे रोज़मर्रा के मार्ग शामिल हैं। काउंटर पर किसी पास या कागज़ की ज़रूरत नहीं — परिचालक शून्य रुपये का टिकट देगा, और इसी से निगम यह गिनती भी रखता है कि कितनी यात्रियों ने सफ़र किया। क्षेत्रीय प्रबंधक परशुराम पांडेय ने शासन का आदेश डिपो तक पहुँचा दिया है, ताकि भीड़ शुरू होने से पहले चालक-परिचालक तैयार रहें। महिला यात्री के साथ चल रहे एक सहयात्री को भी यही छूट मिलेगी — यही बात इस योजना को माँ के साथ किसी परिजन या बहन के साथ चल रहे रिश्तेदार के लिए उपयोगी बनाती है। जाना हो तो डिपो जल्दी पहुँचिए; गुरुवार से शनिवार का यह हिस्सा रक्षाबंधन की सबसे व्यस्त यात्रा-अवधि है और गोरखपुर तथा प्रयागराज मार्ग की बसें सबसे पहले भरती हैं। शून्य किराए का टिकट पूरी यात्रा अपने पास रखें।

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रुद्राक्ष के धागे से अमेरिकन डायमंड तक: 28 अगस्त से पहले सज गए हड़हा सराय और शहर के बाज़ार
खरीदारी6 दिन पहले

रुद्राक्ष के धागे से अमेरिकन डायमंड तक: 28 अगस्त से पहले सज गए हड़हा सराय और शहर के बाज़ार

इस बार रक्षाबंधन शुक्रवार, 28 अगस्त को है — पूर्णिमा 27 की सुबह से 28 की सुबह तक रहेगी — और शहर का राखी बाज़ार आख़िरी दिन का इंतज़ार करता नहीं दिखा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े राखी बाज़ारों में गिना जाने वाला हड़हा सराय सुबह से शाम तक गुलज़ार है, और आसपास के इलाक़ों से भी ख़रीदार पहुँच रहे हैं। दुकानदारों का कहना है कि इस बार बिक्री सामान्य से पहले शुरू हुई और पिछले साल के मुक़ाबले बेहतर चल रही है। धागों पर सजी चीज़ों का दायरा भी काफ़ी बढ़ा है। सादे सूती धागे के साथ मोती और कुंदन के डिज़ाइन, स्टोन और अमेरिकन डायमंड का काम, रुद्राक्ष जड़े धागे, और गणेश, ॐ तथा राम के प्रतीकों वाली राखियाँ मौजूद हैं। बच्चों की पसंद कार्टून कैरेक्टर हैं, युवतियाँ डिज़ाइनर राखियों की ओर जाती हैं; तिरंगे वाली और काल भैरव मुखौटे वाली राखियाँ भी हैं, और म्यूज़िकल भी। क़ीमत कुछ रुपये से लेकर कुछ सौ रुपये तक — यानी एक ही दुकान स्कूल बैग और गिफ़्ट बॉक्स, दोनों के काम आ जाती है। भीड़ हमेशा की तरह आसपास भी फैल रही है — मिठाई, ड्राई फ्रूट, उपहार और पूजा सामग्री की दुकानों पर भी रौनक है। ख़रीदारी करते समय एक चीज़ ज़रूर देखिए: महिला स्वयं सहायता समूहों की बनाई हाथ की, पर्यावरण-अनुकूल सूती राखियाँ, जिन्हें हर साल थोड़ी और जगह मिलती जा रही है।

अपने ही शहर पर सामान्य ज्ञान का पर्चा: काशी सांसद ज्ञान प्रतियोगिता अब 29 अगस्त से 3 सितंबर तक
शिक्षा6 दिन पहले

अपने ही शहर पर सामान्य ज्ञान का पर्चा: काशी सांसद ज्ञान प्रतियोगिता अब 29 अगस्त से 3 सितंबर तक

अगर आपने कभी दोस्तों से यह बहस की है कि कौन-सा घाट पहले बना या बनारस पर किसने क्या लिखा, तो अब उस बहस के साथ एक तारीख़ भी जुड़ गई है। काशी सांसद ज्ञान प्रतियोगिता 2026 की तिथियाँ बदल गई हैं और यह अब 29 अगस्त से 3 सितंबर तक चलेगी। पहले इसकी शुरुआत 25 अगस्त से होनी थी; मुख्य विकास अधिकारी प्रखर सिंह के अनुसार अपरिहार्य कारणों से तिथियाँ आगे बढ़ाई गईं। यह कोई आम क्विज़ नहीं है। इसका पूरा दायरा वाराणसी ही है — मंदिर और घाट, शहर का धार्मिक और ऐतिहासिक जीवन, यहाँ का साहित्य, संगीत और पत्रकारिता की लंबी परंपरा। यही वजह है कि यह उन गिनी-चुनी प्रतियोगिताओं में है जहाँ इसी शहर में पलना-बढ़ना सचमुच काम आता है — और जिस विद्यार्थी ने कबीर को पढ़ा है या बनारस घराने को ध्यान से सुना है, उसके पास दिखाने को कुछ होता है। मुख्य विकास अधिकारी कार्यालय की ओर से काशी हिंदू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ-साथ ज़िला अधिकारियों और शिक्षा विभाग को निर्देश भेजे जा चुके हैं, इसलिए शहर के अधिकांश स्कूल-कॉलेज इसमें शामिल हैं। घोषणा में पंजीकरण की प्रक्रिया, स्थान या पुरस्कार का ब्योरा नहीं दिया गया है, इसलिए हिस्सा लेने के इच्छुक विद्यार्थी अपने संस्थान के कार्यालय या शिक्षा विभाग से प्रक्रिया की जानकारी समय रहते ले लें।

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मालवीय स्टेडियम में 5000 मीटर पैदल चाल का स्वर्ण: 69 ज़िलों के बीच अव्वल रहीं काशी की शिखा यादव
खेल6 दिन पहले

मालवीय स्टेडियम में 5000 मीटर पैदल चाल का स्वर्ण: 69 ज़िलों के बीच अव्वल रहीं काशी की शिखा यादव

पैदल चाल वह स्पर्धा है जिसे कोई तब तक नहीं देखता, जब तक कोई जीत न जाए — और रविवार को यह जीत वाराणसी के नाम रही। शिखा यादव ने 61वीं यूपी राज्य जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में बालिका अंडर-20 वर्ग की 5000 मीटर पैदल चाल का स्वर्ण जीता। आयोजन शहर के मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में हुआ — अपना ही ट्रैक, लंबी दूरी, और ऐसी स्पर्धा जिसमें आख़िरी दम से ज़्यादा धैर्य काम आता है। पोडियम पर काशी से अकेली वही नहीं थीं। वाराणसी के शुभम यादव बालक अंडर-20 की 100 मीटर दौड़ में पहले स्थान पर रहे — यानी एक ही सप्ताहांत में ज़िले को सबसे छोटी और सबसे लंबी, दोनों तरह की स्पर्धाओं में जीत मिली। चैंपियनशिप में 69 ज़िलों के क़रीब 1,900 खिलाड़ी 157 स्पर्धाओं में उतरे, इसलिए मुक़ाबला आसान बिल्कुल नहीं था। यह प्रतियोगिता चयन ट्रायल भी है। यहाँ के नतीजों से चुने गए खिलाड़ी 14 से 16 सितंबर तक देहरादून में होने वाली राष्ट्रीय जूनियर चैंपियनशिप में उतरेंगे। सिगरा और बीएचयू के ट्रैक पर पसीना बहाने वाले युवाओं के लिए कैलेंडर की अगली तारीख़ यही है — और बाक़ी शहर के लिए यह याद दिलाने वाली बात कि काशी का एथलेटिक्स चुपचाप एक ऐसी कतार तैयार कर चुका है, जो नाम आगे भेजती रहती है।

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148 गंडोला और सोलह मिनट का सफ़र: रक्षाबंधन के बाद ट्रायल की तैयारी में काशी का रोपवे
यात्रा6 दिन पहले

148 गंडोला और सोलह मिनट का सफ़र: रक्षाबंधन के बाद ट्रायल की तैयारी में काशी का रोपवे

बनारस जिस घड़ी का इंतज़ार बरसों से कर रहा है, वह एक क़दम और आगे बढ़ी है। अधिकारियों के मुताबिक़ वाराणसी रोपवे के 148 गंडोला का ट्रायल रन रक्षाबंधन के बाद शुरू होगा, जब मानसून का सबसे भारी दौर शहर के पीछे छूट जाएगा। बारिश और रथयात्रा की भीड़ के चलते ट्रायल टलता रहा; कैबिन चढ़ाने से पहले इंजीनियरों को हुक टेस्टिंग पूरी करनी है, और ट्रायल भी कम से कम चार बार दोहराया जाएगा। सबसे ज़्यादा इंतज़ार कैंट से गोदौलिया वाले हिस्से का है — वह रास्ता, जो गलियों के भरे होने पर आधी दोपहर खा जाता है, और जिसे रोपवे सोलह मिनट में तय करने के लिए बनाया गया है। यह देश का पहला ऐसा रोपवे है जिसे पहाड़ी सैर के लिए नहीं, बल्कि रोज़ाना के शहरी सफ़र के लिए बनाया जा रहा है — इसीलिए जाँच धीरे और सबके सामने हो रही है। स्टेशनों पर लिफ्ट और एस्केलेटर, सीसीटीवी, अग्निसुरक्षा प्रणाली और डिजिटल टिकटिंग का काम पूरा किया जा रहा है, और पूरा ढाँचा बुज़ुर्ग यात्रियों, अकेले सफ़र करती महिलाओं और दिव्यांगजनों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। उपकरण यूरोपीय मानकों के हैं और सुरक्षा जाँच की निगरानी स्विस इंजीनियर कर रहे हैं; गोदौलिया स्टेशन पर फ़र्श और वेल्डिंग का काम अब भी चल रहा है। शुरुआत की तारीख़ अभी तय नहीं है — अगला पड़ाव यही ट्रायल है, और पुराने शहर से रोज़ गुज़रने वालों के लिए इस पर नज़र रखना काम की बात होगी।

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किसानों के खेत से नया मोहल्ला: कल्लीपुर में शुरू हुआ 'आनंद काशी', 1994 के बाद वीडीए की पहली टाउनशिप
समाचार8 दिन पहले

किसानों के खेत से नया मोहल्ला: कल्लीपुर में शुरू हुआ 'आनंद काशी', 1994 के बाद वीडीए की पहली टाउनशिप

कल्लीपुर में 'आनंद काशी' का काम शुरू हो गया है — वाराणसी विकास प्राधिकरण की लगभग तीन दशकों में पहली इंटीग्रेटेड गेटेड सिटी। इस पैमाने की टाउनशिप प्राधिकरण ने 1994 की लालपुर योजना के बाद नहीं बसाई है। पहला चरण करीब 4.56 लाख वर्ग मीटर में फैला है। इसमें चार आकारों — 72, 162, 200 और 288 वर्ग मीटर — के 1,004 आवासीय भूखंड हैं, साथ ही 108 व्यावसायिक भूखंड, तीन ग्रुप हाउसिंग भूखंड और एक विद्यालय, एक स्वास्थ्य केंद्र, एक कम्युनिटी सेंटर तथा उपयोगिता सेवाओं के लिए आरक्षित भूमि। भीतरी सड़कें 24, 18, 12 और 9 मीटर की प्रस्तावित हैं, और भूखंड सौंपे जाने से पहले पानी, सीवर, बिजली और जल निकासी की लाइनें बिछाई जाएँगी। हरियाली यहाँ बची-खुची जगह नहीं, योजना का हिस्सा है। कुल क्षेत्रफल का कम से कम पंद्रह प्रतिशत हरा-भरा रहेगा, जो अठारह हिस्सों में बँटा है, और लगभग 3.71 एकड़ में मियावाकी वन विकसित होगा। करीब दो हेक्टेयर के केंद्रीय पार्क में नटराज की प्रतिमा, एक ओपन एयर थिएटर और बच्चों के खेलने की जगह प्रस्तावित है। सबसे शांत ब्योरा यह है कि ज़मीन जुटाई कैसे गई। अनिवार्य अधिग्रहण के बजाय कल्लीपुर और मढ़नी के भूस्वामियों ने लैंड पूलिंग व्यवस्था के तहत लगभग 45 एकड़ ज़मीन दी और बदले में उन्हें विकसित भूखंड मिलेंगे — यानी किसान योजना से हटाए गए लोग नहीं, उसके साझेदार हैं। रेरा पंजीकरण अगस्त के अंत तक होने की उम्मीद है।

राजघाट पर चार शामें, फिर दीयों की रात: 20 से 24 नवंबर तय, गंगा महोत्सव और देव दीपावली की तैयारी शुरू
घटनाएँ8 दिन पहले

राजघाट पर चार शामें, फिर दीयों की रात: 20 से 24 नवंबर तय, गंगा महोत्सव और देव दीपावली की तैयारी शुरू

काशी की साल की सबसे बड़ी रात की तारीख़ अब तय है। गंगा महोत्सव 20 से 23 नवंबर तक चलेगा और देव दीपावली 24 नवंबर को है — यानी नवंबर में बनारस आने की सोच रहे लोग आख़िरी हफ़्ते की भागदौड़ के बजाय तीन महीने पहले से बुकिंग शुरू कर सकते हैं। मुख्य मंच राजघाट होगा, और कार्यक्रम नमो घाट पर भी प्रस्तावित हैं। तारीख़ें और आयोजन का स्वरूप मंडलायुक्त एस. राजलिंगम की अध्यक्षता में हुई समन्वय बैठक से निकला, जिसमें उन्होंने विभागों से कहा कि आयोजन में केवल भव्यता नहीं, काशी की आत्मा दिखनी चाहिए। स्थानीय कलाकारों को कार्यक्रम में असली जगह देने की बात हुई — इनमें शहर की सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के विजेता और राजघाट के पास के गुरुकुलम के विद्यार्थी भी शामिल होंगे, ताकि आने वालों को शहर के संगीत और कला की गंगा-जमुनी लय ही सुनाई दे। इसका एक बाज़ार वाला पहलू भी है। प्रमुख घाटों और होटलों पर 'एक जनपद एक उत्पाद' तथा स्थानीय शिल्प के स्टॉल लगाए जाएँगे, जिससे बनारस के कारीगर इन चार दिनों में आने वाले देशी-विदेशी मेहमानों तक सीधे पहुँच सकें। बाक़ी काम ज़मीनी है और वह अभी से शुरू है: नगर निगम द्वारा घाटों की सिल्ट सफ़ाई, फिर रोशनी और सजावट, सुरक्षा, यातायात और पार्किंग, बिजली, पेयजल, चिकित्सा और अग्निशमन व्यवस्था। तीन महीने पहले ही घाट सूची में आ चुके हैं।

जापानी स्वर में 'हर हर महादेव': सारनाथ, नमो घाट और धाम तक पहुँचा यामानाशी का प्रतिनिधिमंडल
समाचार8 दिन पहले

जापानी स्वर में 'हर हर महादेव': सारनाथ, नमो घाट और धाम तक पहुँचा यामानाशी का प्रतिनिधिमंडल

इस सप्ताहांत श्री काशी विश्वनाथ धाम के गलियारों में औपचारिक सूट पहने पंद्रह मेहमानों का एक समूह खड़ा था — गले में रुद्राक्ष की माला और सावन की भीड़ के साथ 'हर हर महादेव' का उद्घोष। इसके लिए वे बहुत दूर से आए थे। ये मेहमान जापान के यामानाशी प्रांत से आए 109 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के वरिष्ठ सदस्य थे, जिसका नेतृत्व राज्यपाल कोतारो नागासाकी कर रहे थे। प्रतिनिधिमंडल 22 अगस्त की दोपहर वाराणसी पहुँचा और वहीं से शुरुआत की, जहाँ से पहली बार आने वाले कई यात्री करते हैं — सारनाथ, जहाँ भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था और जो जापानी यात्रियों के लिए विशेष महत्व रखता है। उसी शाम उन्होंने नमो घाट से गंगा आरती देखी, और उसके बाद के आयोजन में भारतीय कला, हस्तशिल्प और स्वाद से परिचय हुआ। धाम के दर्शन इसके बाद हुए, जो मंदिर न्यास के सहयोग से कराए गए। काशी में बीते ये दिन केवल पर्यटन के नहीं थे। यामानाशी और उत्तर प्रदेश ने इन्हीं दिनों में एक लंबी साझेदारी पर बात की — ग्रीन हाइड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, बुनियादी ढाँचा, पर्यटन और कौशल प्रशिक्षण। राज्यपाल नागासाकी ने कहा कि उत्तर प्रदेश, यामानाशी और जापान के रिश्ते दीर्घकाल में और मज़बूत होंगे, और ग्रीन हाइड्रोजन पर टिकी ऊर्जा सुरक्षा को उन्होंने व्यापक शांति के उद्देश्य से जोड़ा। बनारस के लिए यह यात्रा उसी बात की याद है, जो यह शहर बहुत लंबे समय से जानता है: सारनाथ की एक सुबह और घाट की एक शाम वे बातचीत खोल देती हैं, जो बैठक का कोई कमरा नहीं खोल पाता।

रुद्राक्ष, फूल और मंगला आरती से शुरुआत: सावन के अंतिम सोमवार पर काशी विश्वनाथ धाम
समाचार8 दिन पहले

रुद्राक्ष, फूल और मंगला आरती से शुरुआत: सावन के अंतिम सोमवार पर काशी विश्वनाथ धाम

सावन का चौथा और अंतिम सोमवार 24 अगस्त को पड़ा और काशी विश्वनाथ धाम उसी के लिए सजा था — मंदिर रुद्राक्ष और फूलों से सजाया गया, दिन की शुरुआत मंगला आरती से हुई और उसके तुरंत बाद जलाभिषेक की कतारें लग गईं। आते हुए कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा की गई और भोर से पहले ही धाम में 'हर हर महादेव' गूँजने लगा। शहर रविवार से ही भरने लगा था। बिहार, प्रयागराज और लखनऊ की ट्रेनों से रातभर स्टेशनों पर भीड़ पहुँचती रही, और कांवड़ियों के लिए तय किए गए ठहराव स्थल सुबह तक पूरी तरह भर गए। सावन सोमवार को दर्शन की योजना बना रहे लोगों के लिए दो व्यावहारिक बातें काम की हैं। सावन के तीनों सोमवार — 10, 17 और 24 अगस्त — को सुगम दर्शन टिकट नहीं दिए गए, यानी दिन नि:शुल्क दर्शन की लाइनों पर ही चला; ऐसे में हाथ में समय लेकर पहुँचना ज़्यादा काम आता है। धाम और कांवड़ मार्ग पर पुलिस व्यवस्था व्यापक रहती है — शहर को ज़ोन और सेक्टर में बाँटकर अलग यातायात योजना लागू की जाती है। सावन ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को श्रद्धालुओं को 'सर' और 'मैडम' कहकर संबोधित करने का निर्देश भी दिया गया था — शिष्टाचार का यह छोटा-सा निर्देश बताता है कि यह महीना यहाँ किस तरह संभाला जाता है। इस सोमवार के साथ काशी में सावन के सबसे भीड़भरे दिन इस वर्ष के लिए पूरे हो गए, और गोदौलिया-मैदागिन की गलियाँ धीरे-धीरे अपनी सामान्य चाल पर लौटने लगेंगी।

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आठ स्वर्ण, नौ रजत और एक ही अकादमी: राष्ट्रीय कराटे से 17 पदक लेकर लौटे काशी के खिलाड़ी
खेल8 दिन पहले

आठ स्वर्ण, नौ रजत और एक ही अकादमी: राष्ट्रीय कराटे से 17 पदक लेकर लौटे काशी के खिलाड़ी

वाराणसी की एक ही अकादमी में अभ्यास करने वाले सत्रह बच्चे इस हफ़्ते लखनऊ गए और सभी पदक लेकर लौटे। 22 और 23 अगस्त को केडी सिंह बाबू स्टेडियम में हुई राष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप में सत्यनारायण कराटे एकेडमी के खिलाड़ियों ने कुल आठ स्वर्ण और नौ रजत पदक जीते। स्वर्ण पदक विजेताओं में अमायरा सिंह, त्रिशा सिंह, नैतिक यादव, शिवेश यादव, विजय यादव, अनाइशा सिंह, विवेक साहू और अमन विश्वकर्मा शामिल रहे। रजत जीतने वालों में कृष्णा सोनकर, अदीप सिंह, आर्य सिंह, ईशान शुक्ला, शिवम सिंह और दुर्गेश यादव के नाम हैं। पदक अलग-अलग आयु वर्गों से आए — कोच इसी बात को सबसे कम बोलते हैं और सबसे ज़्यादा गर्व से देखते हैं, क्योंकि एक वर्ग में नतीजा अच्छा साल होता है और कई वर्गों में नतीजा एक व्यवस्था। शहर में कराटे की ज़मीन चुपचाप तैयार होती रही है। इसी महीने सोनारपुरा में 80 स्कूलों के 279 कराटेका विद्यालयी प्रतियोगिता के लिए उतरे थे, और पहले दिन मैट बालिकाओं के नाम रहा था; यही सिलसिला आगे चलकर राष्ट्रीय पदक सूची में नाम लिखवाता है। बच्चों के लिए स्कूल के बाद कोई खेल चुन रहे परिवारों के लिए बात सीधी है — वाराणसी में अब ऐसी अकादमी है जिसके खिलाड़ी राष्ट्रीय मंच तक पहुँच रहे हैं, और स्कूल की मैट से उस मंच तक का रास्ता शहर के भीतर से ही निकलता है।

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