शाम ढलते ही जगमगा उठता है अस्सी घाट: गंगा आरती की लौ और कैफ़े की रौनक एक साथ
सूरज ढलते ही अस्सी घाट की दूसरी पारी शुरू हो जाती है। काशी के प्रसिद्ध घाटों के दक्षिणी छोर पर बसा यह घाट — जिसका नाम अस्सी नदी के गंगा में मिलने की कथा से जुड़ा है — शाम होते ही बनारस के सबसे जीवंत ठिकानों में बदल जाता है। इसकी चौड़ी सीढ़ियों पर छात्र, परिवार, सैलानी और कलाकार सब एक साथ नज़र आते हैं। शाम का केंद्रबिंदु है अस्सी की गंगा आरती। दशाश्वमेध की भव्य आरती की तुलना में यह अधिक आत्मीय है — यहां दर्शक दीपों की लौ के इतने पास खड़े हो सकते हैं कि घंटियों और शंखनाद के बीच आरती का हर क्षण महसूस होता है। घाट से शाम की छोटी नौका सैर भी उपलब्ध रहती है, जिसमें रोशनी से जगमगाते घाटों की पूरी शृंखला का विहंगम दृश्य मिलता है। सीढ़ियों के आसपास पुराना और नया बनारस साथ-साथ फल-फूल रहा है। अस्सी की गलियों में कुल्हड़ वाली चाय और खस्ता-कचौड़ी के ठेलों से लेकर आधुनिक कॉफ़ी शॉप तक — यहां तक कि स्टारबक्स जैसी अंतरराष्ट्रीय शृंखलाएं भी — सब मौजूद हैं, जिन्हें हाल के व्लॉगर भी खूब दिखा रहे हैं। यही संगम अस्सी को घाट संस्कृति और कैफ़े संस्कृति का मिलन स्थल बनाता है। एक ओर कुल्हड़ चाय पर संगीत और साहित्य की चर्चा चलती है, तो कुछ ही दूरी पर कॉफ़ी के प्याले की तस्वीरें खिंचती हैं। घूमने आने वालों के लिए नुस्खा सरल है — शाम होते ही घाट पहुंचें, सीढ़ियों पर बैठकर आरती देखें, फिर स्थानीय नाश्ते का स्वाद लें और अंत में गंगा किनारे धीमी सैर करें। सूर्यास्त के बाद का अस्सी घाट काशी का सबसे सहज रूप है — जहां प्राचीन आस्था और युवा ऊर्जा एक ही सीढ़ी पर बैठती हैं।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: