काशी विश्वनाथ के आगे: पहली बार बनारस आने वालों के लिए मंदिरों की पूरी परिक्रमा
बनारस आने वाले ज़्यादातर यात्री अपनी सूची में एक ही नाम लिखकर आते हैं — काशी विश्वनाथ। लेकिन काशी की असली आध्यात्मिक बुनावट किसी एक पते में नहीं, बल्कि पूरे जाल में बसी है। आजकल कई यात्रा-वृत्तांत बनाने वाले पुराने शहर की गलियों में एक ही दिन में कई मंदिरों की परिक्रमा दिखा रहे हैं, और यही बात नए श्रद्धालुओं को याद दिला रही है कि धाम के आसपास ही कितना कुछ बसा हुआ है। परंपरागत परिक्रमा भोर से शुरू होती है। घाट पर स्नान के बाद श्रद्धालु काशी विश्वनाथ धाम पहुंचते हैं, जहां कॉरिडोर बनने के बाद दर्शन की व्यवस्था पहले से कहीं सहज हो गई है। पास ही अन्नपूर्णा देवी मंदिर है — वही देवी जो काशी की मान्यता में स्वयं शिव को भी भोजन कराती हैं। मीरघाट के निकट विशालाक्षी मंदिर है, जिसकी गिनती शक्तिपीठों में होती है। पुराने शहर के उत्तर में काल भैरव मंदिर है, जिन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। बनारसी परिवारों की मान्यता है कि उनके दर्शन बिना यात्रा पूरी नहीं मानी जाती। दक्षिण की ओर संकट मोचन हनुमान मंदिर है, जहां मंगल और शनिवार को विशेष भीड़ रहती है। दुर्गाकुंड और शांत तुलसी मानस मंदिर लगभग आमने-सामने खड़े हैं। बीएचयू परिसर में संगमरमर का नया विश्वनाथ मंदिर वह खुलापन और शांति देता है जो गलियों में मुश्किल है। यहां बजट से ज़्यादा योजना काम आती है। सुबह नौ बजे से पहले और शाम सात बजे के बाद भीड़ कम रहती है। कई मंदिरों में जूते और मोबाइल ले जाना मना है, और धाम के पास सामान रखने की सुविधा उपलब्ध है। ऑटो और ई-रिक्शा इन ठिकानों को सस्ते में जोड़ देते हैं, पर गलियों का असली सुख पैदल चलने में ही है। काशी कोई सूची नहीं है। इत्मीनान से की गई यह परिक्रमा शहर को पढ़ने का अपना तरीका बन जाती है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: