घाटों से आगे का बनारस: झुके मंदिर, बुनकरों की गलियाँ और कवियों का शहर
बनारस की तस्वीर अक्सर एक ही फ्रेम में सिमट जाती है — दशाश्वमेध घाट पर घूमते दीपों की लौ और गंगा पर तैरता संध्या आरती का धुआँ। लेकिन जो यात्री इस शहर में एक दिन से अधिक ठहरते हैं, उन्हें जल्दी ही समझ आ जाता है कि काशी की असली विरासत घाट से थोड़ा पीछे, उन संकरी गलियों में साँस लेती है जहाँ सदियों पुराने भवन और कारीगरी आज भी जीवित हैं। घाटों के किनारे चलते हुए वास्तुकला खुद बोलने लगती है। मणिकर्णिका के पास खड़ा रत्नेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनोखी झुकी हुई बनावट के लिए जाना जाता है — साल के कई महीने इसका गर्भगृह गंगा के जल में डूबा रहता है। कुछ ही दूरी पर केदार घाट के ऊपर लाल-सफेद धारियों वाला केदारेश्वर मंदिर उठता है, जो शहर के दक्षिणी हिस्से के सबसे प्राचीन पूजित स्थलों में गिना जाता है। शहर के भीतर जाइए तो कहानी और चौड़ी हो जाती है। भारत माता मंदिर में मूर्ति नहीं, संगमरमर पर उकेरा भारत का उभरा हुआ मानचित्र है — 1936 में खुला यह मंदिर भूगोल को ही श्रद्धा अर्पित करता है। तुलसी मानस मंदिर की दीवारों पर रामचरितमानस की चौपाइयाँ अंकित हैं, जिसका बड़ा हिस्सा गोस्वामी तुलसीदास ने इसी नगर में रचा। लहरतारा स्थित कबीर मठ संत कबीर से जुड़ी भूमि को चिह्नित करता है, जिनके दोहे आज भी बनारस के आँगनों में गाए जाते हैं। विरासत यहाँ केवल पत्थरों में नहीं है। पुराने शहर के बुनकर मोहल्लों में आज भी हथकरघे पर बनारसी साड़ी बुनी जाती है, और पास ही भारतेंदु हरिश्चंद्र का घर खड़ा है, जिन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है। इस बनारस को देखने का सबसे अच्छा तरीका है — सुबह जल्दी, पैदल, जब गलियाँ अभी पूरी तरह जागी न हों।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: