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काशी का भारत माता मंदिर: मकराना संगमरमर में उकेरा भारत का त्रिआयामी मानचित्र

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

काशी आने वाले ज़्यादातर लोग सीधे घाटों की ओर बढ़ जाते हैं, पर वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से मुश्किल से दो किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसा मंदिर खड़ा है जो शहर के बाकी सभी मंदिरों से अलग है। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ परिसर में स्थित भारत माता मंदिर में किसी देवी-देवता की प्रतिमा नहीं है। यहाँ गर्भगृह में सफ़ेद संगमरमर से तराशा हुआ भारत का विशाल उभरा हुआ मानचित्र विराजमान है — यानी आस्था का केंद्र स्वयं यह धरती है। इस अनूठी कल्पना के पीछे थे स्वतंत्रता सेनानी और काशी विद्यापीठ के संस्थापक बाबू शिव प्रसाद गुप्त। यात्रा के दौरान मिट्टी से बना भारत का एक प्रतिरूप देखकर उन्होंने ठान लिया कि ऐसा ही स्थायी स्वरूप वे अपनी काशी में, अपने ही संसाधनों से बनवाएँगे। निर्माण 1918 में शुरू हुआ और बाबू दुर्गा प्रसाद खत्री की देखरेख में लगभग छह वर्ष चला, जिसमें करीब तीस कारीगरों ने छेनी-हथौड़ी से एक-एक इंच नापकर काम किया। 25 अक्टूबर 1936 को महात्मा गांधी ने इसका उद्घाटन किया। असली कमाल मानचित्र का है। राजस्थान के मकराना से लाए गए संगमरमर के करीब 762 पत्थर, हर एक लगभग ग्यारह इंच लंबा-चौड़ा, सटीक स्केल पर तराशे गए। ऊँचाई में एक इंच बराबर लगभग 2,000 फुट और लंबाई में एक इंच बराबर करीब 6.4 मील। इसमें 450 से अधिक पर्वत चोटियाँ, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियाँ तथा सैकड़ों छोटी नदियाँ नाम सहित अंकित हैं। दर्शक यहाँ भारत का सिर्फ़ आकार नहीं, उसका भूदृश्य देखते हैं। अट्ठाईस स्तंभों पर टिके इस भवन के प्रवेश द्वार पर ॐ, गायत्री मंत्र और वंदे मातरम एक साथ उकेरे गए हैं, और परिसर में लगी शिलापट्ट पर निर्माण करने वाले कारीगरों के नाम दर्ज हैं। हरियाली से घिरा यह शांत परिसर आज भी काशी के सबसे संतोषजनक और सबसे कम भीड़ वाले पड़ावों में से एक है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: