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दशाश्वमेध घाट की संध्या: गंगा आरती, जहाँ काशी हर शाम ठहर जाती है

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

वाराणसी में देखने को बहुत कुछ है, पर दशाश्वमेध घाट की संध्या गंगा आरती जैसा दृश्य शायद ही कहीं और मिले। जैसे ही नदी पर से उजाला उतरता है और उस पार का किनारा सिर्फ एक रेखा बनकर रह जाता है, घाट की सीढ़ियाँ भर जाती हैं — तीर्थयात्री, परिवार, विद्यार्थी, दूर देश से आए यात्री। पूरा घाट चुपचाप गंगा की ओर मुँह किए एक विशाल रंगमंच में बदल जाता है। आरती की विधि सदियों से लगभग वैसी ही है। ऊँचे चौकों पर पीतल के दीप, धूप, शंख और मोरपंख सजाए जाते हैं। एक ही रंग के वस्त्र पहने युवा अर्चक ढोल की थाप और मंत्रोच्चार के साथ एक लय में दीप घुमाते हैं। कपूर की लौ से दहकता वह भारी बहुमंज़िला दीप — अंधेरी नदी के सामने आग का धीमा गोल घेरा — वही दृश्य सबसे देर तक मन में बसा रह जाता है। आने वालों के लिए थोड़ी तैयारी काम आती है। आरती सूर्यास्त के आसपास शुरू होती है, इसलिए समय ऋतु के साथ बदलता रहता है। पौन घंटा पहले पहुँचना ही सीढ़ी पर जगह और दूर से झलक के बीच का अंतर है। कई लोग नाव से देखना पसंद करते हैं, जहाँ पूरा घाट जल पर एक जगमगाती रेखा-सा दिखता है। सादा पहनावा, भीड़ में धैर्य और अपने सामान का ध्यान — बस इतना पर्याप्त है। लौटते समय जो बात मन में रह जाती है, वह चमक-दमक नहीं, निरंतरता है। दशाश्वमेध अकेला नहीं है — अस्सी घाट की सुबह-ए-बनारस और नए नमो घाट की आरती के भी अपने भक्त हैं। ये सब मिलकर काशी के दिन को उसी तरह बाँधते हैं जैसे घंटा समय को — हर दिन, सबके लिए, बिना किसी भेद के।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: