ग्यारह हज़ार रुद्राक्ष और कथक की एक शाम: दुर्गाकुंड के कूष्मांडा मंदिर में भजन संध्या से सावन की विदाई
दुर्गाकुंड के आदिशक्ति माँ कूष्मांडा मंदिर में सावन पूर्णिमा ग्यारह हज़ार रुद्राक्ष के दानों के बीच बीती। श्रृंगार पं. ऋषभ दुबे ने किया — रुद्राक्ष के साथ माँ को नए वस्त्र और आभूषण भी धारण कराए गए। दिन भर दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी रही। इसके बाद भव्य आरती हुई और प्रतीक्षा कर रहे सभी लोगों में प्रसाद बाँटा गया। रात संगीत के नाम रही। गीतकार कन्हैया दुबे द्वारा आयोजित भजन संध्या में मंदिर भजनों और सावन की विदाई पर बनारस में गाए जाने वाले लोकगीतों से गूँजता रहा। बीच-बीच में डॉ. ममता टंडन की शिष्याओं ने कथक की प्रस्तुतियाँ दीं, और शाम भर स्थानीय कलाकार एक के बाद एक माइक पर आते रहे। कार्यक्रम के बाद मंदिर के महंत पं. धन्नी शंकर दुबे ने कलाकारों और आयोजकों को स्मृति-चिह्न व भेंट देकर सम्मानित किया। कूष्मांडा नवदुर्गा क्रम की नौ देवियों में से एक हैं और काशी में उनका स्थान दुर्गाकुंड पर है। सावन पूर्णिमा महीने का आख़िरी सुर है, और शहर ने उसे इस बार इसी शांत तरीके से विदा किया — न जुलूस, न बैरिकेडिंग, न भीड़ प्रबंधन की कोई योजना। बस रुद्राक्ष में लिपटा गर्भगृह, देर रात तक भरा हुआ परिसर, और उतनी लंबी शाम जितने कलाकारों के पास गीत थे।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: KTV Varanasi