हरियाली, फल और हिम शृंगार, फिर झूला: सावन के अंतिम बृहस्पतिवार पर सजा दशाश्वमेध का गुरु बृहस्पति देव मंदिर
सावन का आख़िरी बृहस्पतिवार गुरु बृहस्पति का दिन है, और दशाश्वमेध स्थित गुरु बृहस्पति देव मंदिर इसे उसी अंदाज़ में मनाता है जिस अंदाज़ में काशी हर चीज़ मनाती है — ऐसे शृंगार के साथ, जिसके सामने कुछ देर ठहरकर देखना पड़ता है। मंदिर के महंत अजय गिरि बताते हैं कि इस दिन का शृंगार चार अलग-अलग रूपों में होता है। ताज़ी हरियाली का हरियाली शृंगार, जल विहार, फलों का फल शृंगार और बर्फ़ जैसा दिखने वाला हिम शृंगार। विग्रह को अर्धनारीश्वर स्वरूप में सजाकर झूले पर विराजमान किया जाता है — वही झूला परंपरा, जो सावन भर शहर के मंदिरों में चलती रहती है। शाम भर मंदिर प्रांगण में आमंत्रित कलाकार भजन प्रस्तुत करते हैं, और प्रबंधन को श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ का अनुमान है — ऐसे लोग, जो दर्शन के साथ-साथ सजावट देखने भी आते हैं। बृहस्पतिवार को गुरु बृहस्पति की पूजा बनारस के बहुत से घरों की सालभर की आदत है, जो अक्सर पीले धागे और चने की दाल के साथ घर पर ही निभा ली जाती है। इस ख़ास बृहस्पतिवार को जाने लायक़ बनाती है यह बात कि दशाश्वमेध का यह छोटा-सा मंदिर साल का अपना सबसे भव्य शृंगार इसी दिन के लिए बचाकर रखता है। अगर शाम को आपका रास्ता दशाश्वमेध घाट की ओर जा ही रहा है, तो यह बहुत छोटा-सा मोड़ है और सावन की गलियों वाली सैर में आसानी से जुड़ जाता है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: KTV News Varanasi