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काशी के कोतवाल से कबीर चौरा तक: बनारस की गलियों में छिपी असली यात्रा

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

किसी पुराने बनारसी से पूछिए कि काशी की यात्रा कहाँ से शुरू होनी चाहिए, तो जवाब अक्सर गंगा घाट से नहीं, काल भैरव से शुरू होता है। मान्यता है कि भगवान शिव के इस उग्र स्वरूप को काशी का कोतवाल नियुक्त किया गया, और बाबा विश्वनाथ के दर्शन तब तक पूर्ण नहीं माने जाते जब तक भैरव बाबा के दरबार में हाज़िरी न लगा ली जाए। यहाँ की परंपराएँ छोटी हैं, पर बहुत निश्चित। श्रद्धालु तिल का तेल अर्पित करते हैं, जिसे कष्ट हरने और बाबा की कृपा दृष्टि बनाए रखने से जोड़ा जाता है। दर्शन के बाद पुजारी कलाई पर काला धागा बाँधते हैं, जिसे रक्षा कवच माना जाता है। स्थानीय लोग इससे जुड़ा नियम भी बताते हैं — यदि यह धागा अपने आप खुलकर गिर जाए, तो उसकी जगह दूसरा धागा नहीं बाँधा जाता। मंदिर से थोड़ी ही दूर कबीर चौरा है, और यहीं काशी का सबसे दिलचस्प विरोधाभास बसता है। कहा जाता है कि संत कबीर ने अपना लगभग पूरा जीवन इसी मोहल्ले में बिताया और यहीं से उन्होंने काशी की सबसे प्रिय मान्यता पर सवाल उठाया — कि काशी में देह त्यागने भर से मुक्ति मिल जाती है। कबीर का तर्क था कि मुक्ति स्थान से नहीं, कर्म से मिलती है। इन्हीं गलियों में पद्म सम्मान से विभूषित बिरजू महाराज, सितारा देवी और राजन-साजन मिश्र जैसे कलाकार भी रहे, जिसने कबीर चौरा को शास्त्रीय संगीत और नृत्य की सबसे समृद्ध बस्तियों में शामिल कर दिया। और इस सबको बाँधता है यहाँ का स्वाद — कोयले पर सिंकी सत्तू भरी बाटी, स्मोकी बैंगन-आलू का चोखा, देसी घी वाली खिचड़ी और सिलबट्टे पर पिसी चटनी। पास ही चाची की दुकान 1950 के दशक से कचौड़ी परोस रही है, वह भी अपनत्व भरी डाँट के साथ। आस्था, असहमति, संगीत और स्वाद — काशी में इन सबका पता एक ही गली है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: