काल भैरव से कबीर मठ तक: बनारस की वह पैदल यात्रा जो श्रद्धा और स्वाद दोनों से गुज़रती है
वाराणसी के किसी पुराने बाशिंदे से पूछिए कि इस शहर की देखरेख असल में कौन करता है, तो जवाब अक्सर मुस्कुराहट के साथ आता है — काल भैरव। काशी के कोतवाल माने जाने वाले भैरव बाबा परंपरागत रूप से तीर्थयात्रियों का पहला पड़ाव हैं। मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले नगर के रक्षक की अनुमति ली जाती है। विशेश्वरगंज के पास घनी गलियों में स्थित इस मंदिर से लौटते समय श्रद्धालु कलाई पर काला धागा बँधवाते हैं — एक छोटी-सी परंपरा जो पीढ़ियों से चली आ रही है। कुछ किलोमीटर दूर लहरतारा में माहौल पूरी तरह बदल जाता है। कबीर मठ शांत है, सादा है और जल्दबाज़ी से दूर है। पंद्रहवीं सदी के संत कबीर, जिनके दोहे जाति और मत की हर दीवार को नकारते रहे, इसी भूमि से जुड़े हैं। जहाँ भैरव उग्र हैं, वहीं कबीर सहज और निर्भीक। ये दोनों स्थल मिलकर बनारस के उस विस्तार को दिखाते हैं जिसमें श्रद्धा और सवाल एक ही दोपहर में साथ-साथ चलते हैं। इन दोनों के बीच बनारस की तीसरी पहचान बसती है — उसका स्वाद। सुबह कचौड़ी गली की कचौड़ी-सब्ज़ी और जलेबी से शुरू होती है, फिर सर्दियों में कुल्हड़ भर मलइयो और गर्म महीनों में केसर वाली गाढ़ी लस्सी। शाम चाट, ठंडाई और उस बनारसी पान के नाम होती है जो लगभग हर भोजन का समापन करता है। यह यात्रा करने वालों को पूरा एक दिन रखना चाहिए, आरामदायक जूते पहनने चाहिए और पड़ावों के बीच कार की जगह ऑटो या ई-रिक्शा चुनना चाहिए, क्योंकि पुराने शहर की गलियाँ चार पहियों के लिए बहुत सँकरी हैं। मंदिर परिसर में फोटोग्राफी प्रायः वर्जित रहती है और सादा पहनावा दोनों ही स्थलों पर सराहा जाता है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: