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भोर की काशी: बाबा विश्वनाथ के दर्शन से बीएचयू के नए विश्वनाथ मंदिर तक

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

काशी में भक्ति की सुबह सूरज निकलने से बहुत पहले शुरू हो जाती है। श्री काशी विश्वनाथ धाम के बाहर रात करीब तीन बजे से ही कतारें लगने लगती हैं, जब गलियों में अंधेरा होता है और शहर अपनी सबसे शांत अवस्था में होता है। सावन के इन दिनों में दर्शन के लिए तीन-चार घंटे की प्रतीक्षा आम बात है, फिर भी गर्भगृह से बाहर निकलते श्रद्धालुओं के चेहरे पर जो संतोष दिखता है, वह हर इंतज़ार को सार्थक कर देता है। जल्दी उठने का अपना अलग इनाम भी है। भोर होते ही धाम का गंगा द्वार एक ऐसा दृश्य खोल देता है जिसे देखने लोग साल भर आते हैं — गंगा में तैरती नावें, धीरे-धीरे जागते घाट और पहली किरण में चमकते मंदिरों के शिखर। सुबह सात बजे तक घाटों की कतार टहलने वालों और तस्वीरें लेने वालों से गुलज़ार हो जाती है। भूख का स्वादिष्ट समाधान भी पास ही है। मंदिर के पीछे की गलियों के छोटे-छोटे भोजनालय बनारस का पारंपरिक नाश्ता परोसते हैं — गरम कचौड़ी-सब्ज़ी और कुरकुरी जलेबी। लौटते समय श्रद्धालु यादगार के तौर पर फ्रिज मैग्नेट और रुद्राक्ष भी खूब खरीदते हैं। यह आध्यात्मिक यात्रा काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक जाती है। हरियाली से भरे परिसर में स्थित नया विश्वनाथ मंदिर अपने संगमरमरी शिखर और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि महादेव की इस नगरी में बीएचयू की हर इमारत भी किसी मंदिर जैसी ही दिखती है। भोर का दर्शन, गलियों का नाश्ता और बीएचयू की शांति — इन तीनों को जोड़ लें तो काशी की सबसे सुंदर सुबह तैयार हो जाती है। यह शहर जल्दी जागने वालों को कभी निराश नहीं करता।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: