मणिकर्णिका घाट: काशी की वह धरोहर जहाँ गंगा, कथा और काल एक साथ ठहरते हैं
वाराणसी में गंगा के किनारे मीलों तक फैली घाटों की कतार में मणिकर्णिका घाट का स्थान सबसे अलग है। अस्सी से राजघाट तक पैदल चलने वाले यात्री यहाँ सबसे देर तक ठहरते हैं, क्योंकि पत्थर की इन सीढ़ियों से वह कथा जुड़ी है जिसे काशी सदियों से सुनाती आ रही है। घाट का नाम एक प्रिय पौराणिक प्रसंग से आया है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने तपस्या करते हुए यहाँ अपने चक्र से एक कुंड बनाया, और भगवान शिव जब विस्मय में यहाँ पहुँचे तो उनका मणिजड़ित कुंडल इसी जल में गिर पड़ा — इसी से इस स्थान का नाम मणिकर्णिका पड़ा। घाट के पास वह मणिकर्णिका कुंड आज भी मौजूद है, और श्रद्धालु नदी की ओर उतरने से पहले वहाँ शीश झुकाते हैं। बनारस के लोगों के लिए मणिकर्णिका काशी की उस आस्था से अलग नहीं है जो इसे मोक्ष की नगरी कहती है। यही विश्वास इस घाट की दिनचर्या को चौबीसों घंटे गढ़ता है, और हर आगंतुक से एक बात माँगता है — धीरे चलिए, कैमरा नीचे रखिए, और इसे दर्शनीय स्थल नहीं बल्कि श्रद्धा का स्थान मानिए। आसपास की गलियों में धरोहर की कई परतें बिखरी हैं — पास ही अपने प्रसिद्ध झुकाव के साथ खड़ा रत्नेश्वर महादेव मंदिर, अहिल्याबाई काल की पुरानी सीढ़ियाँ, और वे नाविक परिवार जो पीढ़ियों से गंगा का मिज़ाज पढ़ते आए हैं। इस दृष्टि से देखें तो मणिकर्णिका किसी यात्रा-सूची का पड़ाव भर नहीं, बल्कि वह खिड़की है जिससे काशी का अपना समय-बोध दिखाई देता है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: