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सावन में बनारस का असली रंग: अस्सी घाट पर मानसून, खाली घाट और गंगा का उफान

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

जब सावन के बादल काशी के आसमान पर छाते हैं, तो बनारस अपने सबसे सुंदर और सबसे शांत रूप में नज़र आता है। देव दीपावली और सर्दियों में जहाँ घाटों पर पाँव रखने की जगह नहीं मिलती, वहीं अगस्त-सितंबर के महीने ऐसे हैं जब शहर खुलकर साँस लेता है और गंगा अपने पूरे वैभव में बहती हैं। अस्सी घाट पर इस मौसम का नज़ारा ही अलग होता है। उफनती गंगा सीढ़ियों तक चढ़ आती हैं और शाम की गंगा आरती ऊपर के चबूतरों पर होने लगती है। त्योहारों में खचाखच भरी रहने वाली गलियाँ खाली मिलती हैं, दुर्गाकुंड के पास आसानी से पार्किंग मिल जाती है और नदी की ठंडी बयार गर्मी की तपन भुला देती है। बारिश के बीच भी घाटों की दिनचर्या अपनी लय में चलती रहती है। श्रद्धालु स्नान करते हैं, चित्रकार घाटों के दृश्य उकेरते हैं, चाय और नींबू-चाय की दुकानों पर चहल-पहल रहती है, और परिवार मुंडन जैसे संस्कारों के लिए पहुँचते हैं। नावें नमो घाट तक चलती रहती हैं, जहाँ से अर्धचंद्राकार घाटों का मानसूनी दृश्य मन मोह लेता है। घाटों से आगे बढ़ें तो बीएचयू और अस्सी के आसपास नए-नए कैफ़े खुल रहे हैं, जहाँ बेल्जियन डेज़र्ट से लेकर पिज़्ज़ा तक सब मिलता है। पुरानी काशी और नया बनारस यहाँ साथ-साथ फल-फूल रहे हैं। अगर आप मानसून में काशी आने की सोच रहे हैं, तो शहर के भीतर ट्रैफिक डायवर्ज़न के लिए समय लेकर चलें, छाता ज़रूर रखें और बारिश आए तो घाट की सीढ़ियों पर बैठकर गंगा पर गिरती बूँदों का आनंद लें — बनारसी कहते हैं, यही तो असली काशी है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: