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मुक्तिधाम काशी: मोक्ष की नगरी और उसकी संगीत परंपरा

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

वाराणसी के अनेक नामों में एक नाम है मुक्तिधाम। हिंदू परंपरा में काशी को वह नगरी माना गया है जहाँ जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो सकता है। यही एक विश्वास सदियों से इस शहर की बनावट, उसकी अर्थव्यवस्था और उसके स्वभाव को गढ़ता आया है। इस भावना के निशान पूरे शहर में दिखते हैं। उत्तरी घाटों के पास आज भी वे साधारण भवन हैं जिन्हें मुक्ति भवन कहा जाता है, जहाँ देश भर से आए वृद्ध तीर्थयात्री अपने अंतिम दिन बिताने आते हैं। मणिकर्णिका घाट पर चिताएँ पीढ़ियों से निरंतर जलती रही हैं, और उन्हें सँभालने वाले परिवार इस काम को किसी अन्य पारंपरिक कला की तरह विरासत में पाते हैं। बाहर से आने वाले अक्सर यहाँ उदासी की अपेक्षा लेकर आते हैं, पर उन्हें मिलता है एक शांत सहजपन। काशी में मृत्यु को टूटन नहीं, यात्रा का एक पड़ाव माना गया है — और उन्हीं सीढ़ियों पर जीवन अपनी गति से चलता रहता है। यह दर्शन शहर की कला परंपरा से अलग नहीं है। बनारस भारतीय शास्त्रीय संगीत के सबसे बड़े केंद्रों में रहा है — तबले और ठुमरी का बनारस घराना, और सितार तथा शहनाई की वह परंपरा जिसने काशी की ध्वनि को दुनिया तक पहुँचाया। इटावा घराने जैसी परंपराओं से जुड़े कलाकार, जैसे उस्ताद निशात खान, प्रस्तुति को स्वयं एक साधना मानते हैं। यह विचार उस शहर में स्वाभाविक लगता है जहाँ मंदिर की घंटियाँ और सुबह का रियाज़ एक ही हवा साझा करते हैं। यात्रियों के लिए मुक्तिधाम को समझना किसी स्मारक को देखना नहीं, बल्कि ठहरना है। भोर में किसी घाट पर बैठिए और सुनिए — शहर स्वयं अपनी कथा कह देता है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: