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स्तूप से आगे का सारनाथ: हिरन पार्क, मेले की रौनक और बनारस का ठहरा हुआ कोना

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

वाराणसी के भीड़भरे घाटों से करीब दस किलोमीटर दूर बसा है सारनाथ — एक ऐसी जगह जिसकी रफ़्तार शहर से बिल्कुल अलग है। मान्यता है कि बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश यहीं दिया था, और वहीं से वह शिक्षा पूरे एशिया तक फैली। पुराने शहर की गहमागहमी में सुबह बिताने के बाद यहाँ की दोपहर किसी खुली, हरी साँस जैसी लगती है। सारनाथ का केंद्र इसका पुरातत्व परिसर है। विशाल धमेक स्तूप, जिसे सदियों में कई बार सँवारा और बढ़ाया गया, पूरे परिसर पर छाया रहता है और उसके चारों ओर प्राचीन विहारों की खुदाई में निकली नींवें फैली हैं। पास ही अशोक स्तंभ का स्थल है, जिसका सिंह शीर्ष — भारत का राजचिह्न — सारनाथ संग्रहालय में रखा है, जो देश के सबसे पुराने स्थल-संग्रहालयों में गिना जाता है। आसपास थाईलैंड, जापान, तिब्बत, म्यांमार और श्रीलंका के बौद्ध समुदायों द्वारा बनाए मंदिर हैं, हर एक अपनी अलग स्थापत्य शैली में। सारनाथ का हिरन पार्क इसके पुराने नाम मृगदाव की याद दिलाता है। चितकबरे हिरनों वाला यह छोटा-सा बाड़ा परिवारों और स्कूली बच्चों की पसंदीदा जगह है। छुट्टियों और मौसमी मेलों के दिनों में परिसर के आसपास का खुला मैदान दुकानों से भर जाता है — आइसक्रीम की गाड़ियाँ, चाट के ठेले, चूड़ियाँ, खिलौने और छोटे झूले — और विरासत स्थल एक आसान पारिवारिक सैर में बदल जाता है। घूमने की योजना बना रहे हों तो सुबह का समय सबसे अच्छा है, और संग्रहालय के लिए इत्मीनान से एक घंटा रखें। आरामदायक जूते साथ रखें, क्योंकि परिसर काफ़ी फैला हुआ है। वाराणसी कैंट और शहर के बीच से ऑटो और टैक्सी लगातार मिलती हैं, जिससे सारनाथ ज़िले की सबसे सरल आधे दिन की यात्रा बन जाती है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: