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सारनाथ: काशी के घाटों से दस किलोमीटर दूर बसा शांत विरासत स्थल

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

वाराणसी आने वाले ज़्यादातर यात्री अपना समय घाटों और काशी विश्वनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द बिता देते हैं और सारनाथ तक पहुँचते-पहुँचते वक़्त नहीं बचता। यह चूक अफ़सोसजनक है, क्योंकि यह स्थल गंगा तट से मुश्किल से दस किलोमीटर दूर है और यहाँ की सुबह ज़िले की सबसे शांत सुबहों में गिनी जाती है। इस महीने बनी यात्रा फ़िल्मों ने इस ओर फिर ध्यान खींचा है, और मौसम भी अनुकूल है — बारिश के बाद मृगदाव की हरियाली देखने लायक हो जाती है। मान्यता है कि बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहीं दिया था, जिससे उस शिक्षण परंपरा की शुरुआत हुई जो आगे चलकर पूरे एशिया तक फैली। प्राचीन ग्रंथों में इसे ऋषिपत्तन और मृगदाव कहा गया है। आगे की सदियों में यह स्थान विहारों, स्तूपों और अध्ययन कक्षों वाला एक बड़ा विद्या केंद्र बन गया। आज यहाँ का सबसे भव्य अवशेष धमेख स्तूप है — पत्थर और ईंट से बना चालीस मीटर से ऊँचा गोल ढाँचा, जिसकी निचली पट्टी पर बारीक पुष्प और ज्यामितीय नक्काशी है। इसके चारों ओर पुराने विहारों की खुदाई में निकली नींव, धर्मराजिका स्तूप का आधार और अशोक स्तंभ के अवशेष फैले हैं। पास के सारनाथ संग्रहालय में अशोक की वही सिंह शीर्ष प्रतिमा रखी है, जिसे भारत ने अपना राजचिह्न बनाया। बीसवीं सदी में बना मूलगंध कुटी विहार जापानी चित्रकार कोसेत्सु नोसु के भित्तिचित्रों के लिए जाना जाता है। यात्रा की योजना बनाते समय ध्यान रखें — घाटों से सारनाथ पहुँचने में तीस से चालीस मिनट लगते हैं और परिसर घूमने के लिए सुबह का समय सबसे सुखद रहता है। पुरातात्विक परिसर और संग्रहालय दोनों देखने के लिए कम से कम दो घंटे रखें, पानी साथ रखें, और यह याद रखें कि संग्रहालय शुक्रवार को बंद रहता है। यह आज भी एक जीवंत तीर्थस्थल है, इसलिए सादा पहनावा और शांत व्यवहार यहाँ की गरिमा बनाए रखता है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: