सावन की काशी: पैदल चलकर ही खुलती है बनारस की असली गलियाँ
बनारस को समझना है तो पैदल चलिए — और सावन से बेहतर महीना शायद ही कोई हो। भगवान शिव को समर्पित इस मास में घाटों और काशी विश्वनाथ धाम के बीच बुनी हुई सँकरी गलियाँ भक्तों से भर जाती हैं। भीगे पत्थरों और बेलपत्र की गंध, कहीं शंख की ध्वनि, तो कहीं एक गली से दूसरी गली तक गूँजता 'हर हर महादेव' — यही सावन की काशी का असली स्वर है। काशी को 'समय से पुरानी नगरी' कहा जाता है, पर इसकी वजह कोई एक इमारत नहीं। वजह है परतों का मेल। किसी दरवाज़े में बना छोटा-सा मंदिर, आज भी काम आता पुराना कुआँ, बंद दिखते मकान के पीछे चलता बुनकर का करघा, और सदियों से गंगा से मिलती पत्थर की सीढ़ियाँ — ये सब कुछ सौ-दो सौ मीटर के दायरे में मिल जाते हैं। इसी घनत्व के कारण बनारस जल्दबाज़ी में नहीं खुलता; वह उसी यात्री के सामने खुलता है जो एक घंटे के लिए रास्ता भूलने को तैयार हो। पहली बार आने वालों के लिए एक सरल क्रम काम आता है। सूर्योदय से पहले अस्सी घाट पहुँचिए, जहाँ 'सुबह-ए-बनारस' शास्त्रीय संगीत और योग के साथ दिन की शुरुआत करती है। रिक्शा छोड़कर घाटों के साथ-साथ उत्तर की ओर पैदल बढ़िए, दशाश्वमेध पर ठहरिए, और शाम गंगा आरती के साथ पूरी कीजिए। सावन और बरसात में दर्शन की कतारें लंबी रहती हैं, इसलिए समय लेकर चलिए। गीले पत्थरों पर पकड़ वाले जूते पहनिए और नौका विहार से पहले गंगा के जलस्तर संबंधी स्थानीय सूचनाएँ ज़रूर देख लीजिए। धीरे चलिए। बनारस में चलना ही मंज़िल है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: