सावन की सुबह और बनारस की गलियाँ: हींग की कचौड़ी, ठंडई और काशी का शाश्वत स्वाद
सावन के महीने में बनारस की गलियों का स्वाद ही बदल जाता है। यहाँ भक्ति सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं रहती, वह रसोई तक पहुँच जाती है। पुरानी काशी की दुकानों में इस महीने प्याज-लहसुन बंद हो जाता है और तीन-चार पीढ़ियों से चली आ रही वही सात्विक विधि लौट आती है। जो लोग बनारस के असली स्वाद को समझना चाहते हैं, उनके लिए यही सबसे सुंदर समय है। बनारसी दिन की शुरुआत आज भी वैसी ही है — गरम-गरम हींग की कचौड़ी, साथ में पतली और चटपटी आलू की सब्ज़ी, और उसके बाद ताज़ी जलेबी जो मुँह में रखते ही घुल जाए। ऊपर से कुल्हड़ वाली इलायची की चाय। अस्सी घाट, लंका, गोदौलिया और विश्वनाथ गली के आसपास की छोटी-छोटी दुकानें दोपहर से पहले ही खाली हो जाती हैं, इसीलिए स्थानीय लोग सुबह जल्दी निकल पड़ते हैं। दिन चढ़ते ही शहर ठंडाई और लस्सी की ओर मुड़ जाता है। मिट्टी के कुल्हड़ में जमी, मलाई और मेवे से सजी बनारसी लस्सी और बादाम, सौंफ़ तथा गुलाब से बनी ठंडाई सावन की पहचान हैं। शाम होते-होते टमाटर चाट, सोया चाप, वेज रोल, क्रीम रोल और काला जामुन की बारी आती है — वो भी उन्हीं तंग गलियों में खड़े-खड़े। इस खान-पान की सबसे बड़ी खूबी नयापन नहीं, निरंतरता है। वही कोना, वही लोहे की कढ़ाई, वही परिवार। सुबह की कचौड़ी से लेकर शाम की गंगा आरती तक का यह सफ़र बताता है कि काशी में स्वाद और परंपरा कभी अलग नहीं होते।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: