गंगा की लहरों से काशी दर्शन: नाव की सवारी में घाटों की कहानियाँ
वाराणसी को समझने का सबसे सुंदर तरीका है गंगा की बीच धारा से उसे निहारना। भोर के समय पारंपरिक लकड़ी की नाव में बैठकर घाटों के किनारे-किनारे बहना काशी का सबसे प्रिय अनुभव माना जाता है। अस्सी से राजघाट तक फैले 80 से अधिक घाट मानो एक जीवित संग्रहालय हैं, जिनमें हर घाट की अपनी कथा और अपनी पहचान है। नाव यात्रा में हनुमान घाट, शिवाला घाट और महानिर्वाणी घाट जैसे प्रसिद्ध घाट देखने को मिलते हैं। नाविक केवल पतवार ही नहीं चलाते, वे कथावाचक भी होते हैं। नारद घाट से जुड़ी लोकमान्यता ऐसी ही एक रोचक कथा है: कहा जाता है कि इस घाट पर स्नान करने से घर में कलह होती है, इसीलिए श्रद्धालु यहाँ डुबकी लगाने से बचते हैं। दरभंगा घाट अपनी भव्य महल-शैली की वास्तुकला के लिए विख्यात है। कभी दरभंगा राजपरिवार का विश्रामस्थल रहा यह घाट आज विरासत और आधुनिक आतिथ्य का संगम बन चुका है। घाटों के पीछे की गलियों में बनारसी रेशमी साड़ियों की दुकानें सजी रहती हैं, जो सदियों पुरानी बुनकरी परंपरा की जीवंत झलक देती हैं। और संध्या समय जब गंगा आरती के दीप जलते हैं, तो नाव से दिखने वाला वह दृश्य जीवन भर स्मृति में बस जाता है। काशी आने वाले यात्रियों के लिए सुबह या शाम की नौका विहार यात्रा अवश्य करने योग्य अनुभव है — किफायती भी और अविस्मरणीय भी।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: