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दो दिन में काशी यात्रा: भोर के घाट, बाबा विश्वनाथ के दर्शन, सारनाथ और गंगा आरती

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

बनारस की सुबह देखी नहीं, महसूस की जाती है — यही बात हर उस यात्री की जुबान पर होती है जो भोर में गंगा किनारे पहुंचता है। हाल ही में यूट्यूब चैनल 'ऋषि द डुओ' के एक ट्रैवल व्लॉग में दो दिन की बजट यात्रा का ऐसा ही अनुभव साझा किया गया है, जो काशी आने की योजना बना रहे यात्रियों के लिए उपयोगी मार्गदर्शक बन सकता है। दिन की शुरुआत सुबह पांच बजे घाट से होती है, जब सूरज की पहली किरणें गंगा को सुनहरा कर देती हैं और मंदिरों की घंटियों तथा मंत्रों की धुन से पूरा शहर एक अलग ऊर्जा से भर जाता है। यहीं से संकरी गलियों का रास्ता श्री काशी विश्वनाथ धाम तक ले जाता है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। दर्शन की कतारें लंबी जरूर होती हैं, पर भक्त कहते हैं — घंटों के इंतजार के बाद मिनटों का दर्शन भी मन को गहरा सुकून दे जाता है। मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर काशी के कोतवाल काल भैरव के दर्शन का भी विशेष महत्व माना जाता है। इसके बाद यात्रा पहुंचती है सारनाथ, जहां लगभग 43 मीटर ऊंचा धमेक स्तूप उस स्थान की स्मृति में खड़ा है जहां भगवान बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। यहीं सम्राट अशोक का सिंह स्तंभ मिला था, जो आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न है। घाटों की भक्ति के बाद सारनाथ की शांति मन को अलग ही सुकून देती है। शाम को दशाश्वमेध घाट की विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती इस यात्रा को पूर्ण करती है — शंख, घंटियों और दीपों की जगमगाहट के बीच हजारों श्रद्धालु एक साथ प्रार्थना करते हैं। स्कूटी किराए पर लेकर और धर्मशाला में ठहरकर यह पूरी यात्रा कम खर्च में भी संभव है। सच में, जो भोर में जागता है, काशी उसे अपने सबसे सुंदर रूप में मिलती है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: