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काशी के 84 घाट: गंगा किनारे पैदल चलकर देखिए बनारस की असली विरासत

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

वाराणसी का गंगा तट कोई एक सीधी सड़क नहीं, बल्कि 84 घाटों की एक लंबी शृंखला है। हर घाट का अपना नाम, अपना इतिहास, अपनी स्थापत्य शैली और अपनी दिनचर्या है। अस्सी घाट से लेकर आदि केशव घाट तक फैले लगभग सात किलोमीटर के इस रास्ते को पैदल तय करना काशी को समझने का शायद सबसे सुंदर तरीका है। यात्रा की शुरुआत दक्षिण छोर से होती है। अस्सी घाट सुबह-ए-बनारस के साथ जागता है — योग, शहनाई और चाय की गंध के बीच। आगे बढ़ने पर तुलसी घाट मिलता है, जो गोस्वामी तुलसीदास से जुड़ा है। फिर चेत सिंह घाट की किलेनुमा दीवारें और केदार घाट की लाल-सफेद धारियाँ दिखती हैं, जहाँ दक्षिण भारतीय पूजा परंपराओं की गहरी छाप है। बीच का हिस्सा सबसे जीवंत है। दशाश्वमेध घाट पर हर शाम गंगा आरती के लिए हजारों लोग जुटते हैं, और पास ही मणिकर्णिका तथा हरिश्चंद्र घाट की चिताएँ निरंतर जलती रहती हैं। यही काशी का वह दर्शन है जिसमें जीवन और मृत्यु अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही संवाद के दो पक्ष माने गए हैं। पंचगंगा घाट से आगे भीड़ कम हो जाती है। सिंधिया घाट का आधा डूबा शिव मंदिर, मराठा, राजपूत और बंगाली राजपरिवारों द्वारा बनवाए गए घाट यह बताते हैं कि पूरे भारत ने काशी के तट को सँवारा है। यात्रा की सलाह: सूर्योदय के समय निकलें, पाँच-छह घंटे रखें, पकड़ वाले जूते पहनें, पानी साथ रखें और श्मशान घाटों पर कैमरा बंद रखें। बाढ़ के दिनों में अस्सी से पंचगंगा तक की नाव यात्रा वही दृश्य दिखा देती है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: