सावन की काशी: मानसून में क्यों बदल जाता है बनारस की पुरानी गलियों का मिज़ाज
काशी को समझना हो तो पैदल चलिए — और सावन से बेहतर मौसम शायद ही कोई हो। मानसून के इस महीने में गोदौलिया, चौक और विश्वनाथ गली के बीच फैली सँकरी गलियों की रफ़्तार ही बदल जाती है। भगवा पहने नंगे पाँव कांवरिये, "हर हर महादेव" का लगातार गूँजता स्वर, और भीगे पत्थरों की गंध में घुली धूप-अगरबत्ती और गेंदे की महक — यह मिज़ाज साल के बाकी दिनों में नहीं मिलता। पहली बार आने वालों के लिए रास्ता उतना उलझा नहीं है जितना दिखता है। ज़्यादातर पैदल यात्राएँ गोदौलिया चौराहे से शुरू होकर दशाश्वमेध घाट तक पहुँचती हैं, जहाँ शाम की गंगा आरती होती है। वहाँ से घाटों की कतार दक्षिण की ओर मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र होते हुए अस्सी घाट तक जाती है, जहाँ सुबह-ए-बनारस की महफ़िल कहीं ज़्यादा शांत और संगीतमय होती है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर इन्हीं गलियों के भीतर है, जो अब कॉरिडोर के रास्ते सीधे गंगा तट से जुड़ा हुआ है। सावन इस पर अपनी एक अलग परत चढ़ा देता है। महीने के सोमवार विश्वनाथ मंदिर और दुर्गाकुंड, तिलभांडेश्वर जैसे मोहल्ले के शिवालयों में सबसे व्यस्त रहते हैं, और कतारें भोर से पहले ही लग जाती हैं। पुराने राहगीरों की सलाह है — जल्दी निकलिए, हल्के जूते-चप्पल रखिए और सामान कम से कम रखिए। गलियाँ पतली हैं और भीड़ एक साथ बहती है। घाटों के अलावा सारनाथ, रामनगर किला और काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हरा-भरा परिसर दो-तीन दिन की यात्रा को पूरा कर देते हैं। मगर काशी की सबसे गहरी याद अक्सर किसी स्मारक से नहीं बनती। वह बनती है शाम ढलते किसी साधारण गली में, जब कहीं दूर एक घंटी बजती है और पूरी गली जैसे जवाब देने लगती है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: