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लंका गेट की रातें: बीएचयू के दरवाज़े पर सजती बनारस की सबसे ज़िंदा खानपान गली

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

वाराणसी आने वाले ज़्यादातर लोग सीधे घाटों की ओर चल देते हैं। लेकिन बनारस का एक दूसरा चेहरा भी है, जो सूरज ढलने के बाद जागता है, और उसकी शुरुआत होती है लंका गेट से। यह बात काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़े किसी भी व्यक्ति से पूछ लीजिए। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार का विशाल पत्थर का गेट पहचान है, पर असली रौनक़ उससे निकलती सड़क पर होती है। शाम सात बजे के बाद दोनों किनारे ठेले और छोटी दुकानें जगमगा उठती हैं। भारी लोहे की कड़ाही में खौलती टमाटर चाट, कपड़े के नीचे गरम रखा चूड़ा मटर, सीधे चाशनी में उतरती जलेबी, पत्तल पर परोसी कचौड़ी-सब्जी और इतनी गाढ़ी लस्सी कि चम्मच चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में पाव भाजी, मोमोस और चाउमीन भी इसी कतार में शामिल हो गए हैं। लंका को बनारस के बाक़ी खानपान बाज़ारों से अलग करती है यहाँ की भीड़। शोध छात्र, देशभर से आए हॉस्टल के विद्यार्थी, ड्यूटी ख़त्म करके लौटे ऑटो चालक और टहलने निकले परिवार, सब एक ही ठेले पर खड़े मिलते हैं। दाम छात्रों की जेब के मुताबिक़ रहते हैं और मात्रा दिल खोलकर। कई दुकानें दूसरी-तीसरी पीढ़ी से चल रही हैं, जहाँ ग्राहक ऑर्डर से नहीं, चेहरे से पहचाने जाते हैं। अगर जाना हो तो पैदल जाइए, खुले पैसे साथ रखिए और एक ठेले पर थोड़ा चखकर आगे बढ़िए। रात आठ से दस बजे का समय सबसे बढ़िया रहता है। और अंत वैसे ही कीजिए जैसे बनारस करता है, गेट के पास की किसी दुकान से एक बनारसी पान लेकर। लंका कोई पर्यटन स्थल नहीं है। शायद इसीलिए वहाँ एक शाम गुज़ारना बनता है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार:

After Dark at Lanka Gate: How BHU's Doorstep Became | HelloBanaras