Skip to content
HelloBanaras

शहर की कहानीवीडियोSpiritual

काशी के द्वारपाल दण्डपाणि: महादेव की नगरी के रक्षक की अद्भुत कथा

हर प्राचीन नगरी के अपने रक्षक होते हैं, पर काशी के द्वारपाल दण्डपाणि की कथा मन को विशेष रूप से छू जाती है।

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

परंपरा के अनुसार वे एक यक्ष के पुत्र थे और भगवान शिव के प्रति उनकी गहरी भक्ति घर में स्वीकार नहीं की गई। कथा कहती है कि इसी भक्ति के कारण उनके अपने पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया।

कटुता में डूबने के बजाय उस युवा भक्त ने अपने भीतर की राह चुनी। मान्यता है कि उन्होंने हज़ार दिव्य वर्षों तक तप किया और उनके मन में केवल महादेव की नगरी काशी बसी रही। उनकी अटल निष्ठा से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें इस पावन नगरी का द्वारपाल नियुक्त किया और वे दण्डपाणि कहलाए, यानी दण्ड धारण करने वाले।

वाराणसी के श्रद्धालुओं और निवासियों के लिए यह कथा केवल लोककथा नहीं है। दण्डपाणि को काशी के रक्षकों में गिना जाता है और बहुत से भक्त मानते हैं कि काशी की यात्रा तब पूरी होती है जब इस द्वारपाल का भी स्मरण किया जाए। यह कथा सिखाती है कि भक्ति, धैर्य और विनम्रता ठुकराए जाने के क्षण को भी जीवन के उद्देश्य में बदल सकती है।

यह प्रसंग बनारस की जीवंत संस्कृति से भी जुड़ता है। यह नगरी राग, भजन, शहनाई और मंदिर की घंटियों की नगरी है और संगीत के महान केंद्रों में गिनी जाती है। भोर के समय जब गलियों में प्रार्थना और सुर साथ उठते हैं, तब समझ आता है कि काशी की कथाएँ पीढ़ियों से क्यों सुनाई जाती रही हैं।

यदि आप बनारस के आध्यात्मिक रूप को जानना चाहते हैं, तो यात्रा से पहले ऐसी कथाएँ ज़रूर पढ़ें। ये हर घाट, गली और मंदिर को नया अर्थ देती हैं।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: