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नाव से देखिए काशी के घाट: राजा घाट, केदार घाट और उत्तरवाहिनी गंगा की कहानी

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

काशी के घाटों को अगर वाकई समझना हो तो एक बार नाव से देखिए। किनारे पर चलते हुए हर घाट अलग-अलग सीढ़ियों का समूह लगता है, लेकिन गंगा के बीच से देखने पर यही चौरासी घाट लगभग सात किलोमीटर लंबी एक अखंड पत्थर की दीवार बन जाते हैं, जिसमें महल, मंदिर, छतरियाँ और शहर की रोज़मर्रा की धड़कन एक साथ पिरोई हुई दिखती है। इसी कतार में राजा घाट अपनी चौड़ी सीढ़ियों और परतदार पत्थर की बनावट के कारण अलग पहचान रखता है। इसे उन राजघरानों ने बनवाया था जिनकी गंगा किनारे हवेलियाँ हुआ करती थीं। पुराने बनारस का साफ़-सुथरा फ्रेम तलाशने वाले फ़िल्मकारों को यह घाट खूब भाता है, और सुबह के वक़्त यहाँ अखाड़े की कसरत, कपड़े धोते लोग और इत्मीनान की बातचीत, सब एक साथ चलती रहती है। आगे बढ़ने पर केदार घाट आता है, जिसकी लाल-सफ़ेद धारीदार दीवार दूर से ही पहचानी जाती है। ऊपर विराजमान केदारेश्वर मंदिर और शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप की मान्यता इस घाट को विशेष बनाती है, जहाँ शिव और शक्ति एक ही देह में माने जाते हैं। यहाँ पीढ़ियों से बसे दक्षिण भारतीय परिवारों ने मोहल्ले को अपना खानपान और संगीत भी दिया है। घाटों की इस कतार के दूसरे छोर पर काशी नरेश का रामनगर किला गंगा पार से शहर को निहारता है। यहीं नाविक अक्सर वह बात बताते हैं जो काशी की पहचान है, गंगा का उत्तर की ओर मुड़ जाना, यानी उत्तरवाहिनी प्रवाह, जिसे लोकमान्यता में मोक्ष से जोड़ा जाता है। काशी आने वालों के लिए सलाह सीधी है, शाम को घाटों पर पैदल टहलिए, लेकिन एक सुबह नाव से ज़रूर देखिए।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार:

Kashi's Ghats From the Water: Raja Ghat, Kedar Ghat | HelloBanaras