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ठठेरी बाज़ार का स्वाद: बनारस की सौ साल पुरानी कचौड़ी-जलेबी की गलियों में एक सुबह

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

चौक और घाटों के बीच बसा ठठेरी बाज़ार बनारस की सबसे पुरानी बाज़ार गलियों में से एक है। इसका नाम उन ठठेरों के नाम पर पड़ा जो कभी यहाँ पीतल और तांबे के बर्तन गढ़ते थे। पर आज यहाँ आने वाले ज़्यादातर लोग किसी और वजह से आते हैं, और वह वजह है सुबह का नाश्ता। इस गली में एक सुबह की सैर करके ही समझ आ जाता है कि बनारसी खान-पान की इतनी चर्चा क्यों होती है। यहाँ की असली शान है कचौड़ी-सब्ज़ी, जो काशी का पारंपरिक सुबह का भोजन है। दुकानों पर दो तरह की कचौड़ियाँ छनती हैं, एक बड़ी कचौड़ी जिसमें उड़द की दाल का मसालेदार भरावन होता है, और एक छोटी आलू वाली कचौड़ी। इन्हें गोभी-आलू-मटर की सब्ज़ी या चटपटे चने की तरी के साथ परोसा जाता है। ठठेरी बाज़ार की खासियत इसकी दुकानों की उम्र है। कई परिवार चार-पाँच पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं, कुछ की दुकानें सौ-सवा सौ साल पुरानी हैं तो कुछ 1950 के दशक की, और उनकी रेसिपी आज भी लगभग वैसी की वैसी है। कचौड़ी के बाद मिठाई का नंबर आता है। यहाँ की जलेबी बिना किसी रंग के बनती है, इसलिए वह चटख नारंगी नहीं बल्कि सुनहरी दिखती है, और गरम-गरम चाशनी में डुबोकर परोसी जाती है। मौसम के हिसाब से मलाई की मिठाइयाँ, जामुन और थालों में सूखता आम पापड़ भी मिल जाता है। दशकों पुरानी दुकान का मीठा पान खाकर इस नाश्ते को पूरा करना यहाँ की परंपरा है। पहली बार आने वालों के लिए सलाह है कि सुबह सात से दस बजे के बीच पहुँचें जब कचौड़ियाँ सबसे ताज़ी होती हैं, खुले पैसे साथ रखें और स्थानीय लोगों की तरह काउंटर पर खड़े होकर खाने का आनंद लें। ठठेरी बाज़ार दशाश्वमेध घाट और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से पैदल दूरी पर है, इसलिए दर्शन से पहले या बाद में यहाँ रुकना आसान है। यह बनारस की खाद्य विरासत का जीता-जागता हिस्सा है, जो आज भी पुराने ढंग से पकाया जाता है।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: