बदलती काशी की शाम: दालमंडी से गिरजाघर चौराहे तक, जहाँ पुराना बनारस और रोपवे साथ-साथ खड़े हैं
शाम ढलते ही वाराणसी दो रूपों में सामने आती है। एक ओर है संकरी गलियों, नक्काशीदार झरोखों और मंदिरों की घंटियों वाली पुरानी काशी, और दूसरी ओर है एक ऐसा शहर जो चुपचाप नया आकार ले रहा है, जहाँ चौड़े रास्ते और छतों के ऊपर से गुज़रता रोपवे अब शहर की पहचान बनने लगा है। हाल ही में एक यात्रा व्लॉग में दालमंडी से मणिकर्णिका घाट होते हुए गिरजाघर चौराहे तक की शाम की सैर दिखाई गई, जिसमें ये दोनों बनारस एक साथ नज़र आते हैं। दालमंडी शहर के सबसे पुराने बाज़ारों में से एक है। यहाँ की गलियों में आज भी सौ साल पुरानी इमारतें और चहल-पहल भरी दुकानें हैं, लेकिन काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद आसपास का इलाका काफ़ी बदल गया है। यहाँ टहलते हुए पुरानी हवेलियाँ और नया निर्माण एक ही तस्वीर में दिखते हैं, जो याद दिलाता है कि काशी हमेशा अपने स्वरूप को बचाते हुए खुद को नया करती रही है। दालमंडी से गलियाँ मणिकर्णिका घाट तक ले जाती हैं, जहाँ गंगा की लहरें माहौल तय करती हैं, और फिर काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर तक, जो उमस भरी शाम में भी भक्तों से गुलज़ार रहता है। थोड़ा आगे गिरजाघर चौराहे पर वाराणसी रोपवे के खंभे और स्टेशन अब आसमान में उभर आए हैं। कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया तक आवाजाही आसान बनाने के लिए बना यह प्रोजेक्ट सिर्फ़ सुविधा नहीं देगा, बल्कि ऊपर से घाटों, गुंबदों और पुराने शहर की छतों का एक बिल्कुल नया नज़ारा भी दिखाएगा। यात्रियों के लिए सीख साफ़ है: सुबह जल्दी या सूर्यास्त के बाद घूमें, पानी साथ रखें और पैदल चलने का समय निकालें। काशी की कहानी धीरे-धीरे, एक-एक गली में पढ़ी जाती है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: