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बिरहा: भोजपुरी लोकगीतों की वह परंपरा जो काशी की आत्मा गाती है

जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित

माइक और मंच की रोशनी से बहुत पहले, वाराणसी के आसपास के गाँवों के पास अपनी कहानी कहने का अपना ही अंदाज़ था – बिरहा। भोजपुरी की यह लोक-विधा पूर्वांचल की सबसे पुरानी मौखिक परंपराओं में से एक है। ऊँची, खुली आवाज़ में गाया जाने वाला यह गीत परंपरागत रूप से अहीर (यादव) समाज के कलाकारों की देन माना जाता है। शुरुआत में बिरहा विरह और वियोग का गीत था, लेकिन पीढ़ियों के साथ यह इतिहास, भक्ति, समाज और किस्सागोई का जीवंत माध्यम बन गया। पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया (PARI) के भोजपुरी लोक संगीत प्रोजेक्ट में हाल ही में जारी एक प्रस्तुति ने इस परंपरा को फिर से चर्चा में ला दिया है। लोकगायक डॉ. मन्नू यादव और उनके साथियों ने काशी को समर्पित एक बिरहा प्रस्तुत किया है, जिसमें नगरी की धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और संगीत विरासत एक ही कथा-प्रवाह में पिरोई गई है। गीत बाबा विश्वनाथ और गंगा के घाटों से शुरू होकर उन विद्वानों, संगीतकारों और संतों तक पहुँचता है जिन्होंने काशी को सदियों से एक जीवंत विद्यापीठ बनाए रखा है। बिरहा की खासियत इसकी बनावट में है। मुख्य गायक एक लंबी, ऊँची तान से शुरुआत करता है, फिर लयबद्ध पदों में कथा आगे बढ़ती है और साथी हर पंक्ति पर टेक और ताल से जवाब देते हैं – अक्सर सिर्फ ढोलक, करताल और तालियों के सहारे। यह संगीत जितना है, उतना ही रंगमंच भी है; गायक मौके पर ही दोहे गढ़ते हैं और श्रोताओं को कहानी का हिस्सा बना लेते हैं। वाराणसी के लिए बिरहा केवल मनोरंजन नहीं, भोजपुरी पहचान की आवाज़ है, जो गाँव के मेलों, मंदिरों के उत्सवों और शहर के बाहरी इलाकों की रात भर चलने वाली महफ़िलों में सुनाई देती है। पद्मश्री हीरालाल यादव जैसे दिग्गजों ने इस विधा को बनारस से राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया और आज नई पीढ़ी के कलाकार इसे यूट्यूब और सांस्कृतिक आयोजनों के ज़रिए जीवित रखे हुए हैं। अगर आप प्रसिद्ध घाटों से आगे काशी का लोक-हृदय महसूस करना चाहते हैं, तो देव दीपावली के मौसम में या पूर्वांचल के ग्रामीण मेलों में किसी बिरहा मंडली की जीवंत प्रस्तुति ज़रूर सुनें। वहाँ यह शहर अपनी ही बोली में खुद अपनी कहानी गाता मिलेगा।

हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: