शहर की कहानीवीडियोविरासत
काशी के 84 घाट: गंगा किनारे बसी बनारस की आत्मा की एक यात्रा
बनारस की पहचान पूछिए तो जवाब अक्सर गंगा किनारे से शुरू होता है।
जानकारीपूर्ण पोस्ट · हैलोबनारस द्वारा संकलित
काशी के 84 घाट, यानी गंगा में उतरती पत्थर की लंबी सीढ़ियाँ, कई किलोमीटर तक फैला एक अटूट तट बनाते हैं और यही इस शहर का जीवंत हृदय हैं।
हर घाट का अपना मिज़ाज है। दशाश्वमेध घाट अपनी भव्य सांध्य गंगा आरती के लिए जाना जाता है, जब मंत्रों और शंखनाद की लय पर दीप घूमते हैं और नावें जल पर ठहर जाती हैं। दक्षिण छोर पर स्थित अस्सी घाट सुबह की शांति के लिए प्रिय है, जहाँ संगीत, योग और प्रातः पूजा एक ही सीढ़ियों पर साथ चलते हैं। आगे पंचगंगा, सिंधिया और हरिश्चंद्र घाट आस्था, स्थापत्य और परंपरा की अपनी-अपनी कहानियाँ समेटे हैं।
कई घाटों ने अपना वर्तमान रूप अठारहवीं सदी में पाया, जब देश भर के राजाओं और संरक्षकों ने तट पर मंदिर, महल और सीढ़ियाँ बनवाईं। इसीलिए भोर में नाव से देखने पर नक्काशीदार झरोखों से लेकर गुंबददार मंदिरों तक शैलियों का समृद्ध मेल दिखता है, जो पहली किरणों में दमक उठता है।
पहली बार आने वालों के लिए सुबह का समय सबसे सुखद है। कुछ दूर पैदल चलिए, कुल्हड़ की चाय पीजिए, शहर को जागते देखिए और फिर नाव से घाटों का नज़ारा लीजिए। घाटों को स्वच्छ रखें, मंदिरों के पास मर्यादित वस्त्र पहनें और अनुष्ठानों की तस्वीर लेने से पहले अनुमति लें।
घाट कोई एक बार देखने भर का स्मारक नहीं, बल्कि स्नान, पूजा, संगीत और बतकही की वह रोज़ की लय हैं जो पीढ़ियों से चली आ रही है। इन पर चलकर ही समझ आता है कि बनारस को कभी न थमने वाली प्रार्थना का शहर क्यों कहा जाता है।
हैलोबनारस द्वारा सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार: